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अक्षय तृतीया - गाथा द्रौपदी, श्री कृष्ण और अक्षय पात्र की
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अक्षय तृतीया भारत के सबसे प्रमुख त्योहारों में से एक माना जाता है। अक्षय शब्द का अर्थ कभी ना कम होने वाला है।  इस दिन आप जो कुछ भी करेंगे वह कभी कम नहीं होगा और उसका फल दुगना मिलेगा । हिंदू ग्रंथों के अनुसार, इस त्योहार से जुड़ी कई कहानियां हैं, जैसे महर्षि वेद व्यास का महाभारत के महान महाकाव्य का लेखन शुरू करना, भगवती गंगा का पृथ्वी पर अवतरण, युग परिवर्तन की शुरुआत (सतयुग से त्रेतायुग) और कई कथाएं। इस ब्लॉग में हम अक्षय तृतीया के महत्व के साथ-साथ इससे जुड़ी प्रसिद्ध कथाओं के बारे में भी बात करेंगे।

अक्षय तृतीया का पर्व, स्वास्थ्य और समृद्धि का त्योहार है। इस दिन आप जो कुछ भी करेंगे वह कभी कम नहीं होगा। इस दिन सोना या चांदी खरीदना शुभ माना जाता है. लोग इस दिन पूजा, दान और उपवास करते हैं जिससे इन सब का प्रभाव दुगना एवं अक्षय हो जाता है। देश के कई हिस्सों में, इसे अखा तीज के रूप में भी मनाया जाता है।

द्रौपदी और अक्षय पात्र:

महाभारत के आरण्यक पर्व में पांडवों को द्युत के खेल में पराजय पाने के बाद वन के लिए प्रस्थान करना पड़ा था। वनवास के दौरान, युधिष्ठिर ने सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की और इसके फल स्वरुप अक्षय पात्र को प्राप्त किया। भोजन की आपूर्ति करने वाला ये पात्र तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक कि द्रौपदी सहित सभी पांडव पर्याप्त भोजन नहीं कर लेते। जैसे ही सब तृप्त होंगे, यह पात्र  स्वतः ही खली हो जायेगा।

इस बीच, दुर्योधन पांडवो के खिलाफ एक और बुरी चाल को अंजाम देने की योजना बनाये हुए था। उसने महऋषि दुर्वासा से अनुरोध किया कि वे पांडव के आश्रम में जाएँ और उन्हें अपनी सेवा का अवसर दें । इस सब में  उसका असली उदेश्य यह था के महऋषि दुर्वासा उन्हें शाप दें।

द्रौपदी, जो पहले ही अपना भोजन कर चुकी थी, ऋषि दुर्वासा और उनके शिष्यों को देखकर चौंक गई। अक्षय पात्र इस बार उनकी सहायता नहीं करने वाला था। उसके पास उन सभी को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त खाद्य आपूर्ति नहीं थी। आखिर उनकी संख्या 100 से भी कई ऊपर थी। वे भूखे थे और प्रसाद मांग रहे थे, लेकिन यज्ञसैनी के पास देने के लिए कुछ भी नहीं था। यदि वह उन्हें खिलाने में विफल रही, तो पांडवो को महऋषि द्वारा भयानक श्राप झेलना पड़ेगा। उसके पास देने के लिए कुछ नहीं था। अब उसका एकमात्र सहारा स्वयं भगवान वासुदेव थे। उसने कृष्ण से उसी तरह प्रार्थना की जैसे उसने हस्तिनापुर में कौरव सभा में की थी।

भगवान कृष्ण ने ही पांडवों को ऋषि दुर्वासा के प्रकोप से बचाया। उन्होंने द्रौपदी को अक्षय पात्र देखने के लिए कहा कि क्या उसमें थोड़ा सा खाना बचा है? द्रौपदी ने पात्र देखा और इंकार कर दिया। कृष्ण ने बर्तन को  लिया और चावल का एक बचा हुआ दाना लेकर बड़े चाव से खाया। यहाँ कृष्ण ने बचे हुए चावल को खाया और दूसरी ओर दुर्वासा और उनके शिष्यों की श्रुता शांत हुई।  इसी के साथ उन्होंने खुशी और आशीर्वाद देकर पांडवों से विदा ली।  जिस दिन यह लीला की गई थी वह अक्षय तृतीया का दिन था, यह दिन भक्तों के लिए बहुतायत, अनंत धन और समृद्धि लाता है।

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Gurudev GD Vashist

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Gurudev GD Vashist is also the author of Lal Kitab Amrit Vashist Jyotish. He is prominent in the India electronic media, like, leading TV channels like India News, Divya TV, Sadhna TV, Disha TV.
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