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कूर्म अवतार - कैसे हुआ देवी लक्ष्मी का नारायण संग विवाह
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क्षितिः अति विपुल तरे तव तिष्ठति पृष्ठे | धरणि धरण किण चक्र गरिष्ठे || केशव धृत कच्छप रूप जय जगदीश हरे ||

हे मधुसूदन! हे जगदीश! हे केशव! आपने कूर्मरूप अंगीकार कर अपने विशाल पृष्ठ के एक प्रान्तमें मंदार पर्वत को धारण किया है, जिससे आपकी पीठ व्रण के चिन्होंसे गौरवान्वित हो रही है। आपकी सदा जय हो!

भगवान विष्णु के प्रमुख दस अवतारों में दूसरा अवतार भगवान् कूर्म का है। भगवान् कूर्म भगवान् नारायण का एक ऐसा अवतार है जिसका सृजन किसी दुष्ट के संघार के लिए नहीं बल्कि असुर और देवों को एक करने के लिए हुआ था। कूर्म अवतार भगवान् नारायण के प्रमुख दशावतारों में से दूसरे स्थान पर आते है। इस घटनाक्रम की शुरुआत ऋषि दुर्वासा के उस श्राप से हुई जिसके कारण देवताओ से उनका अमरत्व, वैभव, शक्ति और लक्ष्मी सब छिन गया।

एक बार महर्षि दुर्वासा ने अपनी घोर तपस्या से सिद्ध की हुई माला देवराज इंद्र को भेंट की। अपने अहंकार में चूर देवराज ने उस माला को कोई सामान्य माला समझा और उसको अपने वाहन ऐरावत को दे दिया। ऐरावत ने उस माला को अपने पैरों तले रौंद दिया। इस दृश्य को देख कर दुर्वासा ऋषि कुपित हो उठे और सभी देवताओं को ऐश्वर्यहीन होने का श्राप दे डाला। देवताओं का अमरत्व छिन गया। और नारायण से उनकी लक्ष्मी।

देवी लक्ष्मी लुप्त हो चुकी थी। उनके बिना देवताओं का वैभव और शक्ति दोनों खो चुके थे। असुर एक एक करके सभी देवों को परास्त करने लगे मगर अंत में लक्ष्मी के जाने के कारण असुर भी शक्तिहीन होने लगे। इस समस्या को लेकर देव और असुर, दोनों भगवान् ब्रम्हा के पास गए और इस परेशानी का निवारण माँगा। भगवान् ब्रम्हा इस समस्या को लेकर भगवान् शिव के पास पहुँचे और भगवान् शिव सब को लेकर भगवान् नारायण के पास। इस समस्या का एकमात्र निवारण भगवान् नारायण दिया।

समुद्रमन्थन ही इसका एक मात्र उपाय था और इसके लिए देवो और असुरों को एक साथ समंजस्या बैठा कर काम करना था। सब देव और असुर क्षीर सागर को मथने के लिए तैयार थे, नागराज वासुकि महादेव के कंठ से उतर कर मथनी बने और मंदार पर्वत को खीर सागर मथने के लिए लाया गया और समुद्रमन्थन आरम्भ हुआ। जैसे जैसे देव असुर समुद्र को मथ रहे थे वैसे वैसे मंदार पर्वत पानी में डूबता जा रहा था। इस समस्या से देव असुर दोनों ने भगवान् नारायण से सहायता मांगी।

इस समस्या को दूर करने के लिए भगवान् ने एक भव्य कछुए का रूप धारण किया और मंदार पर्वत को अपने खोल पर धारण किया। इस रूप में भगवान् ने समुद्र मंथन को संभव किया और इसी समुद्र से मंथन के दौरान हलाहल विष, ऐरावत, मदिरा, कामधेनु, कल्प वृक्ष, अमृत कलश लिए धन्वन्तरि, चंद्र देव आदि के साथ साथ देवी लक्ष्मी प्राकट्य हुआ जिनको भगवान् नारायण ने अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।




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Gurudev GD Vashist

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Gurudev GD Vashist is also the author of Lal Kitab Amrit Vashist Jyotish. He is prominent in the India electronic media, like, leading TV channels like India News, Divya TV, Sadhna TV, Disha TV.
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