Home / वराह अवतार - आखिर क्यों दिया सनकादिक ऋषि ने जय विजय को श्राप
वराह अवतार - आखिर क्यों दिया सनकादिक ऋषि ने जय विजय को श्राप
Divider


Divider

वसति दशन शिखरे धरणी तव लग्ना |

शशिनि कलंक कल इव निमग्ना |

केशव धृत सूकर रूप जय जगदीश हरे || ३ ||

"हे जगदीश! हे वराहरूपधारी! जिस प्रकार चन्द्रमा अपने भीतर कलंक के सहित सम्मिलित रूपसे दिखाई देता है, उसी प्रकार आपके दाँतों के ऊपर पृथ्वी अवस्थित है "

संसार में जो भी होता है वो सब भगवान् की इच्छा से होता है। पूरा संसार भगवान् की माया शक्ति से चलता है और प्रत्येक घटना के पीछे उन्हीं की लीला होती है। भगवान् की लीला से गूंगा बोल सकता है, पंगु पर्वत चढ़ सकता है और शांत भी विकराल हो सकता है और यही भगवान् ब्रम्हा के मानस पुत्र सनकादिक मुनि के साथ हुआ।

सृष्टि के विस्तार के लिए भगवान् ब्रह्म ने चार बालक रूपी पुत्रों को जन्म दिया और उन्हें संसार का विस्तार करने का आदेश दिया। मगर वह चार कुमार ब्रह्म ज्ञान को पाना चाहते थे जिसके कारण उन्होंने अपने पिता की आज्ञा का पालन करने से माना कर दिया और सांसारिक धर्म को छोड़ संन्यास आश्रम में प्रवृत्त हो गए। ब्रह्म देव के ये चार पुत्र -सनक, सनन्दन, सनातन और सनत कुमार सनकादिक ऋषि के नाम से विख्यात हुए।

श्रीमद भागवत् जी की एक कथा के अनुसार एक बार सनकादिक ऋषि भगवान् नारायण के दर्शन करने के लिए वैकुण्ठ पहुँचे जहाँ भगवान् के दरबान जय और विजय ने उन्हें अंदर जाने से रोक लिया। इस बात से सदा शांत और दयाशील रहने वाले सनकादिक मुनि अत्यंत रुष्ट हो गए और दोनों दरबानों को मृत्युलोक में 100 बार जन्म लेने का श्राप दे दिया। श्राप के भय से जय और विजय सनकादिक ऋषि के चरणों में गिर कर क्षमा मांगने लगे जिससे ऋषि का क्रोध तो शांत हुआ मगर अब वो कुछ नहीं कर सकते थे। श्राप उनके मुख से निकल चूका था। वह श्राप ख़तम तो नहीं कर सकते थे मगर उसके प्रभाव को जरूर कम कर सकते थे। उन्होंने जय और विजय को एक और विकल्प दिया, -- या तो 100 बार साधारण जन्म लो या फिर 3 बार महापापी रूप में जन्म लेकर जल्दी से जल्दी वैकुण्ठ वापस आओ। इतने में भगवान् वह स्वयं प्रकट हुए और सबको अपनी इच्छा व्यक्त की। शांत सनत कुमार भगवान् की लीला से ही क्रोधित हुए और अनुशासित जय विजय भी भगवान् की इच्छा से ही दम्भी हो गए। भगवान् की इच्छा से ही अब जय और विजय असुर रूप में जन्म लेने वाले थे और उन्हीं के हाथों मुक्ति पाने वाले थे।

यही जय और विजय अपने पहले जन्म में उद्दंड और स्वेच्छाचारी हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में जन्मे। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों भाइयों को ब्रम्हा जी से अजेयता का वरदान प्राप्त था जिसके कारण उन होने इंद्र लोक पर अतिक्रमण कर लिया। मगर इतने में भी हिरण्याक्ष के अहंकार की पुष्टि नहीं हुई और वो वरुण देव की राजधानी विभावरी नगरी में जा पहुंचा। वरुण देव ने हिरण्याक्ष को भगवान् विष्णु की अपार शक्तियों के बारे में बताते हुए खूब महिमामण्डित किया जिसको सुन कर हिरण्याक्ष अधीर हो उठा। अभी भी संसार में कोई था जो उसकी शक्ति को टक्कर दे सकता था। वरुण देव की बात सुनकर हिरण्याक्ष भगवान विष्णु की खोज में समुद्र के नीचे रसातल में जा पहुंचा। रसातल में पहुँचकर उसने एक विस्मयजनक दृश्य देखा।

हिरण्याक्ष एक वराह अपने दाँतों के ऊपर धरती को उठाए हुए देख कर आश्चर्यचकित हो उठा। वह मन ही मन सोचने लगा के आखिर यह वराह रूप में कौन है? कोई भी साधारण वराह धरती को अपने दाँतों के ऊपर नहीं उठा सकता। अवश्य यह वराह के रूप में भगवान विष्णु ही हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए हिरण्याक्ष ने वराह भगवान् को ललकारा। भगवान् वराह ने उसकी अभद्र भाषा को दरकिनार कर अपनी पत्नी भूदेवी को तारामंडल में दोबारा स्थापित किया और आते ही हिरण्याक्ष से युद्ध शुरू कर दिया। यह युद्ध बहुत समय तक चला और अंत में भगवान् वराह के चरण प्रहार से हिरण्याक्ष ने प्राण छोड़ दिए।




Follow Us

Gurudev GD Vashist

Divider

Gurudev GD Vashist is also the author of Lal Kitab Amrit Vashist Jyotish. He is prominent in the India electronic media, like, leading TV channels like India News, Divya TV, Sadhna TV, Disha TV.
Read More

WhatsApp
Phone