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कबीर दास जयंती 2022 - पढ़ें कबीर दास जी के प्रसिद्ध दोहे और उनके अर्थ
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कबीर दास जी कहने को तो मुसलमान माता पिता के यहाँ जन्मे थे मगर उनकी पहचान आज भी एक रसिक वैष्णव संत के रूप में की जाती है। कबीर दास जी का जीवन एक साधना स्वरूप था। जैसे कोई संत माला के मनकों पर भगवान् का नाम पिरोता हो बिलकुल वैसे ही वह अपनी छोटी सी कुटिया में कपड़ा बुनते और राम राम जपते मानो हर गाँठ में राम नाम पिरो रहें हो। कबीर दास जी के दोहे आज तक अत्यंत सुप्रसिद्ध है और जीवन की असली सच्चाई को दर्शाते है। उनके दोहों में भगवत् भक्ति और प्रेम के साथ साथ अत्यंत गूढ़ दर्शन भी छुपा है जो आज भी प्राणी मात्र के लिए ज्ञानामृत का काम करता है। कबीर दास जी के जीवन की सबसे बड़ी सीख प्रेम और भगवत् परायणता है यह बात उनके दोहों में स्पष्ट समझी जा सकती है।

कबीर दास जी कहते है -

"चींटी के पग नूपुर बाजे सो भी साहिब सुनता है"

इस दोहे में कबीर दास जी भगवान् के सर्वत्र व्याप्त होने का आभास कराते है। भगवान् ही सभी कारणों के कारण है और ऐसा कुछ नहीं जो भगवान् से छुपा हो। मगर सवाल ये उठता है के अगर एक छोटी सी चींटी के पग में अगर घुँघरू बांध दिए जाये तो वो भी भगवान् सुनते है तो हमारी प्रार्थनाओं का जवाब क्यों नहीं देते?

इस बात का जवाब देते हुए कबीर दास जी कहते है के-

"सुख में सुमिरन न किया, दु:ख में किया याद ।

कह कबीरा ता दास की, कौन सुने फ़रियाद ॥"

मनुष्य इतना स्वार्थी है के भगवान् का सुमिरन विपत्ति काल में करता है। जब सुख होता है तो भगवान् का स्मरण कभी नहीं आता और जैसे ही दुःख आते है वैसे ही प्रार्थना का दौर शुरू हो जाता है। भगवान् ऐसे स्वार्थी मन में कैसे आ सकते है भला? -अगर सच्चे मन से ईश साधना करोगे तो भगवान् स्वयं तुम्हारे पास आएँगे। अब सवाल ये उठता है के पूजा अर्चना तो सब विधिविधान से करते है मगर भगवान् सबको क्यों नहीं दिखते? क्या ये मार्ग उचित नहीं ?

इसके जवाब में कबीर जी बताते है के -

कबीर माला मनहि कि, और संसारी भीख ।

माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख ॥

कबीर दास जी कहते है के असली माला तो मन से होती है। खाली बाहरी आडम्बर के लिए की गई साधना का कोई लाभ नहीं। पूजा अनुष्ठान करना वेदानुगत व्यवहार है मगर जब तक भगवान् को मन से न पुकारा जाये और मन को निर्मल ना किया जाये तब तक भगवत् प्राप्ति नहीं हो सकती। अब सवाल ये उठता है के मन निर्मल कैसे हो? कलियुगी प्राणी लोभ मोह राग द्वेष से भरा हुआ है। अब ऐसे में कैसे मन की शुद्धि हो?

इस बात के जवाब में कबीर जी कहते है -

"लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।

पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥"

कबीर दास जी कहते है के केवल राम नाम ही है जो मन को शुद्ध और निर्मल बनाता है। राम नाम ही असल दौलत है जिससे प्राणी मात्र का जीवन और मृत्यु दोनों सफल हो जाते है। प्राणी सारा जीवन भौतिक धन को एकत्रित करने में निकाल देता है और ये भूल जाता है के राम नाम ही एक ऐसा धन है जो प्राणी मात्र की मृत्यु के बाद उसके साथ जाता है। कबीर दास जी कहते है के असली धन राम नाम है और इसको जीतना लूट सकता है लूट ले। माया को छोड़ और हरी नाम की शरण ले।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर ।

पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ।।

कबीर दास जी मनुष्य के अहंकार को उसका सबसे बड़ा शत्रु बताते है। कबीर दास जी कहते है के अहंकार से व्यक्ति इतना मद हो जाता है के उसकी उपलब्धि का किसी को भी फ़ायदा नहीं होता। अगर व्यक्ति किसी की सहायता ना कर सके तो उसकी उपलब्धि का कोई मतलब नहीं। कबीर दास जी ऐसे व्यक्ति को एक खजूर के पेड़ के सामान बताते है। ऐसे पेड़ बन के भी क्या लाभ जिसकी ना तो छाया सुलभ है और ना ही फल। यही लोग होते है जो अपनी उपलब्धि और माया रूपी धन में इतने आसक्त हो जाते है के वे संसार के जन्म मरण के चंगुल में फँसे रह जाते है। इस संसार रूपी चक्की में माया रूपी गेहूँ में चिपके घुन के समान पिस जाते है और कभी मुक्त नहीं हो पाते।

इस सन्दर्भ में कबीर दास जी कहते है।

"माया मरी न मन मरा, मर मर गए शरीर ।

आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर ।। "

प्राणी मात्र का शरीर तो ख़तम हो जाता है मगर उसकी आशा और तृष्णा का कभी अंत नहीं होता जिसके कारण मनुष्य कभी मोक्ष को प्राप्त नहीं होता। यही आशा तृष्णा और मोह सांसारिक बंधन का मूल है।

मनुष्य गलतियों का पुतला है इस बात में कोई संदेह नहीं। गलतियाँ करना मनुष्य का स्वभाव है मगर गलती कर के उसका पश्चाताप ना करना मनुष्य को भगवान् से दूर ले जाता है।

इस बात को समझते हुए कबीर दास जी कहते है के -

"मैं अपराधी जन्म का, नख-सिख भरा विकार ।

तुम दाता दुख भंजना, मेरा करो सम्हार ।।"

मनुष्य शरीर इन्द्रियों के आधीन है जिसके कारण वह गलती करता ही करता है। खुद को सर्वोपरि ना समझकर और अहंकार त्याग कर अगर मनुष्य अपनी सारी गलतियों को मान उनको भगवान् के श्री चरण कमलों में समर्पित कर दे तो अत्यंत दयालु भगवान् आपकी सभी गलतियों को माफ़ कर आपको अपनी शरण में ले लेंगे। बस जरूरत है तो भगवान को सच्चे दिल से पुकारने की।

अपने जीवनकाल में कबीर दास जी ने ना जाने कितनों को विषय वासना से अलग किया और आज भी अपने शब्दों से ना जाने कितनों को भगवत् प्रेम का आभास करा रहे है। इतने आक्रान्ताओं के हमलों के बाद भी केवल कबीर दास जी जैसे संतों के कारण ही आज सनातन धर्म की नीव आज भी मजबूत है। इस वर्ष कबीर दास जी की जयंती पर हम सबको यह प्रण लेना चाहिए के हमारी आने वाली पीढ़ी भी कबीर दास जी के दर्शन को समझे और उनकी सीख का अनुपालन करें।




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Gurudev GD Vashist

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Gurudev GD Vashist is also the author of Lal Kitab Amrit Vashist Jyotish. He is prominent in the India electronic media, like, leading TV channels like India News, Divya TV, Sadhna TV, Disha TV.
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