Home / नरसिंह अवतार - जानें क्या थी हिरण्यकशिपु की पांच शर्तें
नरसिंह अवतार - जानें क्या थी हिरण्यकशिपु की पांच शर्तें
Divider


Divider

तव कर-कमल-वरे नखम् अद्भुत शृंगम् ||

दलित-हिरण्यकशिपु-तनु-भृंगम्||

केशव धृत-नरहरि रूप जय जगदीश हरे ||4||

"हे नृसिंह रूप धारण करने वाले श्री हरिः ! हे केशव! जैसे कोई अपने नखों के बीच भ्रमर को सरलतापूर्वक मसल देता है उसी प्रकार आपने भी अपने अद्भुत नुकीले नखों द्वारा भ्रमर रूप दैत्य हिरण्यकशिपु के शरीर को विदीर्ण कर दिया। आपकी सदा जय हो !"

भक्त वत्सल भगवान् अपने भक्तो के लिए क्या कुछ नहीं करते। कभी मत्स्य बनकर जल प्रलय से लड़ जाते है तो कभी कूर्म बन कर अपने भक्तो की लाज बचाते है। ऐसे ही अपने भक्त की रक्षा के लिए भगवान् ने एक ऐसा रूप धरा जो ब्रह्मदेव की रचना से बिलकुल अलग था। ऐसा रूप जो अजन्मा था। ऐसा रूप जो ना तो पूरा मनुष्य था और ना पशु। वह रूप था भगवान् विष्णु का चौथा अवतार भगवान् नरसिंघ। भगवान् का ये स्वरुप आधा शेर का और आधा मनुष्य का है। इस स्वरूप में भगवान् ने भक्त शिरोमणि प्रल्हाद महाराज की रक्षा की थी।

इस कथा का प्रारम्भ हिरण्याक्ष के वध से होता है। हिरण्याक्ष हिरण्यकशिपु का भाई था जिस का वध भगवान् के तीसरे स्वरूप भगवान् वराहदेव ने किया था। हिरण्याक्ष की मृत्यु के बाद हिरण्यकशिपु के मन में भगवान् विष्णु के प्रति शत्रुता जागृत हुई जिसके चलते हिरण्यकशिपु ने भगवान् विष्णु से प्रतिशोध लेने की ठान ली। हिरण्यकशिपु ने भगवान् ब्रह्मा की घोर तपस्या करने का संकल्प लिया और इस संकल्प को पूरा करने के लिए चल दिया।

जब हिरण्यकशिपु तपस्या के लिए गया तब देवराज इन्द्र ने उसकी पत्नी कद्रू का अपहरण कर लिया। देवराज कद्रू के अजन्मे बच्चे का विनाश करना चाहते थे ताकि हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु जैसे और दैत्य इस दुनिया में ना आ पाए। देवऋषि नारद को जब ये बात पता लगी तब उन्होंने देवराज को ऐसा करने से रोका और कद्रू को अपने साथ अपने आश्रम में ले आये। वही कद्रू के अजन्मे बालक को ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हुआ और वो बालक जन्म से पहले ही भगवत् प्रेम से सराबोर हो उठा। ये बालक और कोई नहीं बल्कि भगवान् के अनन्य भक्त प्रल्हाद थे।

दूसरी ओर हिरण्यकशिपु को ब्रह्म देव से ऐसा वर मिला जिससे वो लगभग अजय और अमर हो गया। और वो वर था के ना तो वो दिन में मारा जाये और न ही रात में ,, ना किसी अस्त्र से मारा जाये और ना ही किसी शस्त्र से, ना तो घर के अंदर मरे ना बाहर, ना ही ब्रह्मा के बनाये बारह महीनों में, और ना ही उनके बनाये किसी भी जीव के हाथो। अब हिरण्यकशिपु अजय हो गया था। उसने पृथ्वी और पाताल दोनों पर अपना राज्य स्थापित कर लिया और अब उसकी नजर इंद्रलोक अमरावती पर थी। उसने पृथ्वी पर भगवान् नारायण की पूजा को वर्जित कर दिया और स्वयं को भगवान् घोषित कर दिया। उसके अत्याचार दिन प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे थे और उसके इस पापों पर अंकुश लगाना अनिवार्य हो गया था। मगर समस्या ये थी के अब उसको मार पाना लगभग असंभव हो गया था।

पढ़े भक्त प्रल्हाद की भक्ति की गाथा

हिरण्यकशिपु के अत्याचारों को ख़तम करने और अपने भक्त प्रल्हाद की रक्षा के लिए भगवान् विष्णु ने नरसिंह अवतार धरा। भगवान् का ये स्वरूप खम्भा तोड़ कर प्रकट हुआ था और ब्रह्मा जी की रचना के परे था। भगवान् नरसिंघ ने हिरण्याक्ष के साथ भरी दोपहरी में भीषण युद्ध किया, जो न ही दिन का समय था और ना ही रात का। भगवान् ने हिरण्यकशिपु को अधिक मास में परस्त किया, जो ब्रह्मा के बनाये बारह महीनों का भाग नहीं बल्कि नारायण का बनाया हुआ महीना था। भगवान् ने हिरण्यकशिपु को महल की चौखट में अपनी जंघा पर धर मारा, जो ना ही पृथ्वी पर था और ना आकाश और ना ही घर के अंदर या बाहर था। भगवान् ने अपने भयानक नाखूनों ने उसकी छाती को भेज डाला जो ना तो अस्त्रों में आता है और ना शस्त्रों में। और ऐसे कर के भगवान् ने ब्रह्माजी के वरदान का मान भी रखा और हिरण्यकशिपु की साड़ी शर्तों का पालन करते हुए उसका संहार किया।

इसी के साथ जय और विजय का पहला जन्म समाप्त हुआ और स्वयं उनके आराध्य भगवान् विष्णु के द्वारा उनका उद्धार हुआ। अब वे दोनों त्रेता युग में दोबारा जन्म लेने वाले थे।




Follow Us

Gurudev GD Vashist

Divider

Gurudev GD Vashist is also the author of Lal Kitab Amrit Vashist Jyotish. He is prominent in the India electronic media, like, leading TV channels like India News, Divya TV, Sadhna TV, Disha TV.
Read More

WhatsApp
Phone