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रामबोला दुबे कैसे बने गोस्वामी तुलसीदास जी
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संत तुलसीदास जी जिन्होंने भगवान् राम के मधुर चरित्र की रचना श्री रामचरितमानस के रूप में की वह और कोई नहीं बल्कि भगवान् वाल्मीकि जी का कलयुग के अवतार थे। कलयुग में संस्कृत भाषा के विलुप्त होने की बात भगवान् वेद व्यास जी ने भविष्यपुराण में की जो आज सत्य जान पड़ती है। ऐसे में भगवान् वाल्मीकि जी का तुलसीदास बन कर जन्म लेना और रामायण की रामचरितमानस के रूप में पुनः रचना करना मात्र संयोग नहीं बल्कि एक दैवीय घटना है। गोस्वामी तुलसीदास जी का जीवन भी विस्मयकारी घटनाओ से भरा हुआ है। ऐसी अलौकिक घटनाये जो किसी साधारण मनुष्य का प्रारब्ध नहीं बल्कि एक महान संत की निशानी है। 

नन्हे बालक तुलसी ने साधारण बालकों की तरह रुदन नहीं किया बल्कि श्री राम का नाम लेते हुए अपनी जीवन लीला का आरम्भ किया। जन्म लेते ही श्री राम का नाम लेने के कारण बालक का नाम "रामबोला" पड़ा। पिता द्वारा तजे जाने से लेकर गुरु प्राप्ति तक, रामबोला का जीवन अत्यंत कठिन रहा। गुरु प्राप्ति हुई तो राम भोला "तुलसीराम" हुआ और कुछ समय बाद उनका विवाह एक ब्राह्मण कन्या रत्नावली से हुआ। और यही देवी रत्नावली थी जिनके कारण रामबोला संत तुलसीदास बना।

गोस्वामी तुलसीदास जी का जीवन भी विस्मयकारी घटनाओं से भरा हुआ है। ऐसी अलौकिक घटनायें किसी साधारण मनुष्य का प्रारब्ध नहीं बल्कि एक महान संत की निशानी है। 

गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म गर्भ के बारहवें महीने में हुआ। जन्म के समय उनके मुँह में २२ दाँत थे जिसे देख उनके माता पिता भय से चूर हो गए और इस असाधारण बालक का त्याग करने पर मजबूर हो गए। जन्म के कुछ समय बाद हि तुलसीदास जी की माँ का देहांत हो गया। इस बात से यह सिद्ध हो गया के यह बालक जो अपनी ही माँ के लिए मृत्यु लाये वह किसी के लिए भी शुभ नहीं हो सकता। एक साधारण मनुष्य जो सदैव माया से घिरा हो, उसकी बुद्धि एक सीमा तक ही चीज़ों को समझ पाती है। यही कारण है के तुलसीदास जी के पिता एक ब्राह्मण होने के बाद भी अपने पुत्र की अलौकिकता को नहीं जान पाए थे। 

विवाहोपरांत तुलसीदास जी अपनी पत्नी में इतना आसक्त हो गए के उसके बिना अब वह एक दिन भी नहीं बिता पाते। विवाह के बाद जब देवी रत्नावली अपने माता पिता के घर गईं तब तुलसीदास जी को काशी में रहते हुए अपनी पत्नी की बहुत याद आई तब व्याकुलता वश वह अपने गुरु की आज्ञा ले कर वह अपनी पत्नी से मिल के उनके गाओ चले गए। पत्नी में आसक्ति इतनी के मध्य रात्रि में उफान से भरी तीव्र यमुना नदी तैर कर पार की और अपनी पत्नी के पास जा पहुँचे। द्वार बंद होने के कारण तुलसीदास जी ने झरोके से ही रत्नावली के कक्ष में कूद मारी और उन्हे साथ चलने को कहा।

अंधेरी तूफानी रात में अपने पति को इस तरह आया देख कर रत्नावली भय और लज्जा से चकित हो गयी। और उन्होंने तुलसीदास को तुरंत वापिस जाने को कहा। तुलसीदास के अधिक आग्रह करने पर रत्नावली ने उन्हें ऐसे कटाक्ष मारे जिन्हें सुन कर तुलसीदास जी के ज्ञान चक्षु खुले। "जीव का स्वरूप नित्य हरी दास" देवि रत्नावली के दिए ज्ञानोपदेश से ही तुलसीदास जी को यह सत्य स्पष्ट नज़र आ रहा था। और ऐसे रामबोला संत श्री तुलसीदास बने। 

संत श्री तुलसीदास जी के जयंती पर उनका यह मधुर संक्षिप्त जीवन चरित्र हमको एक ही सीख देता है जो मनुष्य जीवन के परम उद्देश्य को जानने के लिए पर्याप्त है। मनुष्य सदैव सुख शांति और आनंद की कामना करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य उस सच्चिदानंद भगवान् हरी का ही अंश है जो स्वयं सत् चित्त आनंद हैं। वही भगवान् हरी संसार की उत्पत्ति के कारण है और वही भगवान् दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों का विनाश करने वाले है। मनुष्य हरी का दास बन कर परमसुख की प्राप्ति कर सकता है। हरी की शरण के अलावा कोई भी सांसारिक सुख सत्य और शाश्वत नहीं। केवल हरी ही है जो शाश्वत आनंद के सागर है।

हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥

रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥ 




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Gurudev GD Vashist

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Gurudev GD Vashist is also the author of Lal Kitab Amrit Vashist Jyotish. He is prominent in the India electronic media, like, leading TV channels like India News, Divya TV, Sadhna TV, Disha TV.
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