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कोरोना के कहर से सभी देशो ने अपनाया सनातन धर्म का अंतिम संस्कार

कोरोना के कहर से सभी देशो ने अपनाया सनातन धर्म का अंतिम संस्कार

इन दिनो कोरोना का कहर एक भयानक महामारी का रूप लेता जा रहा है। जिससे विश्व के 100 से अधिक देश प्रभावित हो चुके है और ये अपनी पहुँच और भी देशो मे लगातार बनाता ही जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह एक अंतराष्ट्रीय महामारी के रूप मे फैलता जा रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग ने ये शख्त हिदायत दी है की कोरोना से पीड़ित मरने वालों के शव को अग्नि मे जलाया (cremation, दाह संस्कार) जाये और burial (शवो को दफनाने) पर रोक लगा दी जाये। जिससे कि ये विषाणु दूसरों तक न फैले। चीन सहित बहुत से देश ने अब इसपद्दयती को अपनाना शुरू कर दिया है जो कि भारतीय सनातन धर्म की प्राचीन सभ्यता की ही देंन है। जिसके अंतर्गत शव को अंतिम दर्शन के बाद अग्नि मे समर्पित कर दिया जाता है।

ऐसा माना जाता है कि चिता की ये अग्नि शव की शुद्धिकरण करती है। जिसे सनातनियों द्वारा हजारो वर्षो से शव के अंतिम संस्कार के रूप मे अपनाया गया है। ऋग्वेद की ऋचाओ मे भी शव के दाह संस्कार को ही मान्यता दी गयी है इसके साथ ही गरुँण पुराण मे भी इसके प्रमाण मिलते है। सनातन धर्म की परंपरा के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को अपने सम्पूर्ण जीवन मे 16 संस्कारो को पूर्ण करना होता है। जिसे जन्म से लेकर मृत्यु तक उम्र के हर पड़ाव पर निभाया जाता है। इसमे 16वें संस्कार या अन्त्योष्टि संस्कार को व्यक्ति का द्विज निभाता है। जिसमे मरने के बाद शव को मुखाग्नि (चिता की आग) देना और अस्थि विसर्जन से लेकर 13 या 17 दिन तक चलने वाले प्रत्येक कर्म कांड, विधि-विधान, पूजा पाठ आदि मे सम्मिलितहोना है। 

क्या है सनातनियों का अन्त्योष्टि संस्कार

वांसासि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोSपराणि |
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देहि ||

श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए कहा था कि आत्मा अजर अमर है। आत्मा का न तो नाश होता है और न ही ये जीवित होती है। आत्मा तो ऊर्जा का ही एक रूप है जो एक रूप से दूसरे रूप मे परिवर्तित होती रहती है। जिस प्रकार से मनुष्य पुराने वस्त्रो को त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है ठीक उसी प्रकार जीवात्मा भी पुराने शरीर को त्याग कर नए शरीर मे प्रवेश करती है।  

सनातन धर्म मे मृत्यु के बाद शव को 24 घंटे के भीतर जलाए जाने कि परंपरा है क्योंकि ये विज्ञान द्वारा भी सिद्ध हुआ है कि मृत्यु के उपरांत शव मे बहुत से हानिकारक किटाणु और जीवाणु उत्पन्न होते है जो कि पर्यावरण और मानव के स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते है। कई बार क्या होता है कि मरने वाला व्यक्ति किसी संक्रामक रोग से पीड़ित होता है। जिससे किमृत्यु के उपरांत उसके शरीर का विघटन बहुत तेज़ी से होने के कारण उसके शारीर कि समस्त क्रिया शिथिल पड़ जाती है और शरीर मे सड़न पैदा होने लगती है। जो कि आस -पास के लोगो के लिए या खास करके पदयात्रा मे शामिल होने वाले लोगो के लिए भयावह हो सकती है। इसलिए मृत्यु होने के 24 घंटे तक के भीतर समस्त क्रिया कलापों जैसे शव को स्नान कराना नए वस्त्र धारण कराना अंतिम दर्शन के बाद अग्नि मे प्रजावलित करना सम्मिलित है।

वेदो मे वर्णित है कि हमारा शरीर पाँच तत्वो से मिल कर बना है जो कि पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश है। सनातन धर्म मे जो विधान अंतिम संस्कार के रूप मे वर्णित है उसका एक मात्र यहीं उद्देश्य है कि जिन तत्वो से ये शरीर निर्मित हुआ है इसे उन्ही  पंचतत्वो मे वीलीन कर दिया जाये।

सनातन धर्म के सिद्धान्त

सनातन धर्म के अंतर्गत ऐसे बहुत से विधि विधान सम्मिलित है जो कि किसी निश्चित उद्देश्य को ध्यान मे रख कर तब के समय के बुद्धिजीवियों द्वारा बनाए गए है। जिसमे वेद, पुराण, धर्म,ज्योतिष, आयुर्वेद इत्यादि सभी का मिश्रण है। हमारी सनातनी परंपरा मे दोनों हाथ जोड़ कर लोगो का अभिवादन किया जाता है जो कि दूसरे के शरीर मे व्याप्त किसी रोग या अन्य किसी किटाणु को हमारे शरीर प्रवेश नही देती। इसके साथ ही चप्पल जूतों का घर या मंदिर मे प्रवेश वर्जित है जो कि बाहर से आने वाली बीमारियों को घर के भीतर प्रवेश नही देती।

सही मायने मे बात कि जाये तो सनातन धर्म मे ना जाने ऐसे कितने ही रहस्य है जो कि सनातन संस्कृति के आधार स्तम्भ है जिसे आज नही तो कल पूरी दुनिया स्वीकार करने हेतु बाध्य हो जाएगी।


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(Updated Date & Time :- 2020-03-19 09:59:12 )


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