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समय खराब हो, तो मित्र भी शत्रु लगने लगते है

समय खराब हो, तो मित्र भी शत्रु लगने लगते है

यह भारतीय कथा महाभारत और भागवत गीता से ली गयी है । इस लोक कथा का हिन्दू धर्म में बहुत जगह पर जिक्र मिलता है। यह कथा एक कौवे और उसके मित्र गरुण की है l एक बार एक कौवे की गरूड़ से दोस्ती हो गई। दोनों काफी समय साथ गुजारते थे। उनमें मित्रता इतनी गहरी हो गई थी कि आपस में कभी कोई बात नहीं छिपाते थे। एक दिन दोनों एक नदी के किनारे पेड़ पर बैठे बात कर रहे थे तभी एक यमदूत उधर से गुजरा। वो कौवे को देख कर मुस्कुराया।

तब गरूड़ और कौवे ने उस यमदूत को अनदेखा किया और अपनी बातों में लग गए। लेकिन, अगले दिन फिर वही हुआ। दोनों बातें कर रहे थे तभी वो ही यमदूत फिर उधर से गुजरा। वो फिर कौवे को देखकर मुस्कुराया। इस बार कौवे को कुछ शंका हुई। उसने गरूड़ से कहा कि ये यमदूत मुझे देखकर कल भी मुस्कुराया था और आज भी वैसे ही मुस्कुराया। कुछ गड़बड़ है। हो सकता है मेरी मृत्यु आने वाली है। गरूड़ ने उसे समझाया कि ऐसा कुछ नहीं है। ये एक संयोग भी हो सकता है। तुम चिंता मत करो। दो-तीन और ऐसे ही निकले। रोज यमदूत कौवे को देखर मुस्कुराता।

अब तो कौवे को यकीन हो गया कि निश्चित ही मेरी मौत नजदीक है। उसने गरूड़ से कहा मित्र मैं मरना नहीं चाहता, लेकिन ये यमदूत जरूर एक-दो दिन में मेरे प्राण निकालकर ले जाएगा। ये रोज ही मुझे देखकर मुस्कुराता है। गरूड़ को भी लगा कि हो सकता है कौवे का शक सही हो। उसने कौवे को धैर्य बंधाया। गरूड़ ने कौवे से कहा तुम चिंता मत करो मित्र मैं तुम्हें यहां से इतनी दूर ले जाऊंगा कि ये यमदूत तुम्हें दिखाई ही ना दे।

गरूड़ ने कौवे को अपनी पीठ पर बैठाया और उस जंगल से हजारों किलोमीटर दूर कैलाश पर्वत पर ले गया। दोनों को अब ये डर नहीं रहा कि यहां कोई उन्हें परेशान कर सकता है। लेकिन, वे जैसे ही कैलाश पर्वत पर पहुंचकर एक गुफा तक पहुंचे, वहां वो यमदूत पहले से ही मौजूद था। उसने कौवे को देखते ही उस पर पाश फेंक कर उसके प्राण निकाल लिए। गरूड़ देखता रह गया। उसने यमदूत से पूछा तुमने इसे मारा क्यों? यमदूत ने कहा कि इसकी मौत इसी समय लिखी थी, इसलिए इसके प्राण निकाल लिए। गरूड़ ने फिर पूछा तो फिर तुम इसे देखकर उस जंगल में मुस्कुराते क्यों थे। इसे मारना ही था तो वहीं मार देते।

यमदूत ने जवाब दिया, इसकी मौत कैलाश पर्वत पर ही लिखी थी, लेकिन चार-पांच दिन पहले इसे उस जंगल में देखकर मुझे ये आश्चर्य हो रहा था कि ये इतने कम समय में वहां पहुंचेगा कैसे, क्योंकि इसके पंख भी छोटे हैं और ये लंबी उड़ान भी नहीं भर सकता तो हजारों योजन दूर कैलाश तक ये पहुंचेगा कैसा? यही सोचकर मैं रोज मुस्कुराकर गुजर जाया करता था। लेकिन, भाग्य देखो, तुम इसके परममित्र ही, इसे यहां तक इतने कम समय में ले आए।

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