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क्या है हनुमानाष्टक पाठ के लाभ

क्या है हनुमानाष्टक पाठ के लाभ

वैसे तो हनुमान जी को राम भक्त, बजरंगबली, संकट मोचन, अंजनी पुत्र,  पवन पुत्र आदि की संज्ञा दी गई है कहा जाता है कि इनकी आराधना से भक्तों के ऊपर से सभी प्रकार के संकट दूर हो जाते हैं. जो कोई भी जातक हनुमान जी की पूजा मंगलवार के दिन करता है उसको इसके बहुत सारे अच्छे परिणाम जिंदगी में देखने को मिलते हैं.
ऐसा माना जाता है कि दुनिया में जब तक श्री राम का नाम रहेगा तब तक हनुमान का नाम भी उतना ही सम्मान के साथ लिया जाएगा.
ऐसा भी  माना गया है कि मंगलवार के दिन यदि व्यक्ति हनुमानाष्टक पाठ करता है तो उसके जीवन से सभी प्रकार के दुःख -दर्द नष्ट हो जाते हैं. और बजरंगबली स्वयं उन पर अपनी कृपा बरसाते हैं. पवन पुत्र हनुमान अपने भक्तों के ऊपर आने वाले सभी दुखों को हर लेते हैं. यदि आप कभी भी संकट की स्थिति में है तो हनुमानाष्टक पाठ का वाचन अवश्य करें. 
तो आइये जानते है आखिर हनुमानाष्टक पाठ हैं क्या  ? और इसके लाभों के बारे में आपको अवगत कराते हैं.
हनुमानाष्टक पाठ के चमत्कारिक  लाभ 
जो व्यक्ति मुख्यरूप से मंगलवार के दिन हनुमाष्टक का पाठ करता है उसके समस्त दुःखो  का नाश हो जाता है.
हनुमानाष्टक पाठ का वाचन करने से व्यक्ति के शारीरिक बल  में बढ़ोतरी होती है.  इसके साथ ही व्यक्ति में शौर्य और तेज का इजाफा देखने को मिलता है.
हनुमानाष्टक  पाठ करने से व्यक्ति में बौद्धिक क्षमता अधिक विकसित होती हैं.
हनुमानाष्टक पाठ करने वाले व्यक्ति को विद्या की प्राप्ति होती है।
हनुमाष्टक का पाठ करने वाला व्यक्ति स्वस्थ जीवन व्यतीत करता है।
पारिवारिक जीवन में सुख-शांति, प्रेम और एकता बनी रहती है।
इसका पाठ करने से शत्रुओं का नाश होता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, हनुमाष्टक का पाठ करने से कुंडली में मंगल ग्रह मजबूत होता है।
हनुमानाष्टक 

बाल समय रवि भक्ष लियो तब,
तीनहुं लोक भयो अंधियारों।
ताहि सों त्रास भयो जग को,
यह संकट काहु सों जात न टारो।
देवन आनि करी बिनती तब,
छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो।
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ 1 ॥

बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि,
जात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महामुनि साप दियो तब,
चाहिए कौन बिचार बिचारो।
कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,
सो तुम दास के सोक निवारो ॥ 2 ॥ 
को नहीं जानत है ...

अंगद के संग लेन गए सिय,
खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौं हम सो जु,
बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो।
हेरी थके तट सिन्धु सबे तब,
लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ॥ 3 ॥
 को नहीं जानत है ...

रावण त्रास दई सिय को सब,
राक्षसी सों कही सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु,
जाए महा रजनीचर मारो।
चाहत सीय असोक सों आगि सु,
दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो ॥ 4 ॥ 
को नहीं जानत है ...

बान लग्यो उर लछिमन के तब,
प्राण तजे सुत रावन मारो।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत,
तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो।
आनि सजीवन हाथ दिए तब,
लछिमन के तुम प्रान उबारो ॥ 5 ॥
 को नहीं जानत है ...

रावन जुध अजान कियो तब,
नाग कि फाँस सबै सिर डारो।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,
मोह भयो यह संकट भारो I
आनि खगेस तबै हनुमान जु,
बंधन काटि सुत्रास निवारो ॥ 6 ॥ 
को नहीं जानत है ...

बंधु समेत जबै अहिरावन,
लै रघुनाथ पताल सिधारो।
देवहीं पूजि भलि विधि सों बलि,
देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो।
जाये सहाए भयो तब ही,
अहिरावन सैन्य समेत संहारो ॥ 7 ॥ 
को नहीं जानत है ...

काज किये बड़ देवन के तुम,
बीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को,
जो तुमसे नहिं जात है टारो।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,
जो कछु संकट होए हमारो ॥ 8 ॥
 को नहीं जानत है ...
॥ दोहा ॥
लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लंगूर।
वज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर ॥


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(Updated Date & Time :- 2020-04-12 12:15:09 )


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