Astroscience
भीष्म अष्टमी - पितामह भीष्म के पुनर्जन्म से इच्छामृत्यु तक का रहस्य

भीष्म अष्टमी - पितामह भीष्म के पुनर्जन्म से इच्छामृत्यु तक का रहस्य

भीष्म अष्टमी – 2 फरवरी

दिन – रविवार

माघ मास के शुक्ल पक्ष मे पड़ने वाली अष्टमी ,भीष्म अष्टमी  के रूप मे मनाई जाती है। प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत के अनुसार आज के हि दिन पितामह भीष्म अपने प्राणो का त्याग कर पंचतत्व मे विलीन हुए थे। भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। इसलिए उन्होने अपनी मृत्यु का दिन स्वयं चुना और माघ मास के शुक्ल पक्ष कि अष्टमी मे जब भगवान सूर्य छः मास का समय दक्षिणायन मे व्यतीत कर उत्तरायन मे प्रवेश करते है तो इस बेला मे प्राणो का त्याग कर सीधा मोक्ष प्राप्ति कि ओर अग्रसर होना ही सर्वोतम समझा।इसलिए आज के दिन को प्रतिज्ञा,त्याग, समर्पण, बलिदान और राष्ट्रभक्ति का सूचक माना जाता है। आज के दिन व्रत कि भी परंपरा है।

 

ग्रंथ क्या कहते है

महाभारत मे ये वर्णित है कि पितामह भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान अपने पिता से प्राप्त था। महाभारत के युद्ध मे भीष्म ने भले हि कौरवो का साथ दिया था। परंतु विजय का आशीर्वाद तो पांडवो को दिया था। तो आज इस लेख के माध्यम से पितामह भीष्म के जीवन से जुड़ी सारे रहस्यो से पर्दा उठाने का प्रयास करेंगे।

 

भीष्म के पुनर्जन्म कि गाथा

कहते है कि एक बार पृथु आदि वसु अपनी पत्नियों के साथ मेरु पर्वतो पर विचरण कर रहे थे। वहीं पास मे ऋषि वशिष्ठ का आश्रम था जहां उनकी गाय बंधी हुई थी।इन वसु कन्याओ मे से एक ने अपने पति द्यो से कहा कि मुझे वो गाय चाहिए जिसे द्यो ने ऋषि के आश्रम से चुरा लिया। ऋषि वशिष्ठ को इन सभी बातो कि ख़बर मिल गयी और उन्होने सभी वसुओ को पृथ्वी पर मनुष्य योनि मे पाप भोगने का श्राप दे दिया। बहुत आग्रह और क्षमा प्रार्थना के बाद सभी वसुओ को क्षमा कर दिया गया परंतु द्यो को लंबे समय तक पृथ्वी पर मनुष्य जाती मे पाप भोगने का श्राप वापस नही लिया। और यहीं द्यो नामक वसु “भीष्म”गंगा पुत्र बन कर पृथ्वीलोक मे जन्मे।

 

भीष्म ने क्यों ली आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा

कहा जाता है कि एक बार हस्तीनपुर के राजा शांतनु शिकार खेलते हुए गंगा नदी के तट पर पहुँचे तो वहाँ उन्हे एक अत्यंत सुंदर कन्या दिखाई पड़ी। जिस पर वो मुग्ध हो गए उन्होने उसी क्षण उस रूपवती से विवाह का प्रस्ताव रखा। परंतु उस स्त्री ने महाराजा के सामने यह शर्त रखी कि उसके द्वारा किए गए किसी काम मे महाराज हस्तक्षेप नही करेंगे। जिसे राजा ने भलीपूर्वक मान लिया। इसके बाद दोनों का जीवन हस्तीनपुर के महलो मे अच्छे से गुजरने लगा। परंतु जब शांतनु कि संतान हुई तो गंगा ने उसे नदी मे प्रवाहित कर दिया परंतु राजा कुछ कह न सके क्योंकि वो वचनबद्ध थे। धीरे-धीरे करके शांतनु के सातों पुत्रो को गंगा ने नदी कि धारा मे प्रवाहित कर दिया परंतु जब वो आठवे पुत्र को प्रवाहित करने जा रही थी तब शांतनु के सब्र का बांध टूट गया और उन्होने गंगा से इसका कारण पूछा तब गंगा ने ऋषि वशिष्ठ द्वारा दिये गए श्राप कि गाथा सुनाई और बताया कि ये आपके सातों  पुत्र वसु थे जिन्हे मनुष्य युग से मुक्ति मिल परंतु ये आठवा पुत्र द्यो है जिसे अभी और पाप भोगने के लिए पृथ्वी पर रहना होगा। यह कह कर गंगा अपने पुत्र को लेकर चली गयी। पत्नी के जाने के बाद महाराज उदास रहने लगे। धीरे- धीरे दिन बीतता गया। एक दिन महाराज गंगा किनारे से गुजर रहे थे तभी उन्होने देखा कि गंगा का पानी रुका हुआ है जब उन्होने जाकर देखा तो वहाँ एक अत्यंत पराक्रमी युवा अपनी बाणों के द्वारा गंगा कि धारा रोके हुए था। ज्यो ही उन्होने आगे कदम बढ़ाए तभी उनकी पत्नी गंगा प्रकट हुई और उन्होने बताया कि ये आपका आठवा पुत्र देवव्रत है। जिसने महर्षि वशिष्ठ से वेदो का ज्ञान तथा परशुराम से अस्त्र-शस्त्रो का ज्ञान अर्जित किया है।

कुछ हि समय बाद महाराज शांतनु ने देवव्रत को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। और शासन का कार्यभार देवव्रत को सौपने कि घोषणा कर दी । देवव्रत ने कुछ हि दिनो मे प्रजा का दिल जीत लिया।समय बीत रहा था तभी एक दिन महाराज शांतनु नदी के किनारे शिकार करने गए थे । वहाँ उन्हे एक अत्यंत सुंदर कन्या सत्यवती दिखी जिसपे वो मंत्र-मुग्ध हो गए और उस कन्या के पिता के पास विवाह का प्रस्ताव लेकर गए। परंतु सत्यवती के पिता (निषाद) हरिदास ने अपनी पुत्री का हाथ राजा के हाथो मे सौपने से पहले ये शर्त रखी कि उनकी बेटी कि कोख से जन्मी संतान ही हस्तीनपुर कि गद्दी पर राज करेगी। इस पर राजा संतनु संशय मे पड़ गए और उदास मन और खाली हाथ के साथ हस्तीनपुर वापस लौट गए क्योंकि उन्होने गंगा पुत्र देवव्रत को पहले ही अपना उत्तराधिकारी चुन लिया था। अपने पिता की ये दशा देख देवव्रत ने इसका कारण जानना चाहा महाराज के मंत्री ने देवव्रत को निषाद हरिदास की शर्त बताई ।उसी रात देवव्रत खुद केवट हरिदास के पास जाकर अपने पिता के लिए उनकी कन्या सत्यवती कि मांग कि। केवट ने वही शर्त दोहराई जिसे भीष्म ने अपने पिता कि खुशी के लिए मान ली। परंतु फिर केवट ने कहा कि यदि कल को तुम्हारी संतान सत्यवती के पुत्र को मार कर राज हड़प ली तो? तब उस क्षण भीष्म ने पृथ्वी और आकाश कि सौगंध खाकर प्रतिज्ञा ली की “मैं गंगा पुत्र देवव्रत आजीवन ब्रह्मचर्य कि प्रतिज्ञा लेता हूँ “ और सत्यवती को लेकर हस्तीनपुर लौट गए। अपनी इस अखंड प्रतिज्ञा से ही देवव्रत ‘भीष्म”कहलाए। और इसी वक़्त उन्हे अपने पिता से इच्छामृत्युका वरदान मिला। जो कि महाभारत के रणक्षेत्र मे देखा गया अप्रतिम दृश्य था।

 

भीष्म कि मृत्यु का रहस्य

सत्यवती और महाराज शांतनु कि दो संताने पैदा हुई चित्रांगद और विचित्रवीर। इन दोनों कि युवावस्था मे ही पिता शांतनु का निधन हो गया। जिससेचित्रांगद को गद्दी पे बैठाया गया। परंतु वो गंधर्व नरेश के हाथो युद्ध मे मारा गया। फिर विचित्रवीर गद्दी पर बैठा। उसी समय काशी नरेश ने अपनी तीन पुत्री अम्बा,अंबिका और अंबालिका का स्वयंवर रचाया जिसमे द्वेष के कारण हस्तीनपुर के राजा को आमंत्रण नही भेजा गया। जिससे रुष्ट होकर भीष्म स्वयं ही काशी गए और वहाँ सारे राजाओ और स्वयं काशी नरेश को हरा कर उनकी तीनों पुत्रियों को अपने भाई विचित्रवीर से विवाह करवाने के लिए ले आए। परंतु उसमे से अम्बा ने भीष्म को बताया कि उसने मन ही मन मे शाल्व नरेश को अपने पति के रूप मे स्वीकार कर लिया है। तब भीष्म ने अम्बा को ससम्मान पूर्वक शाल्वनरेश के पास छोड़ दिया परंतु शाल्वनरेश ने अम्बा को स्वीकारने से इनकार कर दिया। तब अम्बा ने भीष्म के गुरु ऋषि परशुराम से आग्रह किया की भीष्म अब उससे विवाह करे परंतु आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत भीष्म को बाध्य  किए हुए था। जिसके कारण भीष्म को अपने ही गुरु भगवान परशुराम से युद्ध करना पड़ा। इस युद्ध का कोई नतीजा नही निकला तो अंत मे परशुराम ने स्वयं हि अस्त्र रख दिये। उसी वक्त अम्बा ने यह प्रतिज्ञा कि भीष्म कि मृत्यु का कारण वहीं बनेगी। और उसने अगले जन्म मे शिखंडी के रूप मे जन्म लिया।

 

मृत्यु कि शय्या पर लेटे भीष्म को देख काल भी हाथ जोड़े एक ओर खड़े थे

महाभारत के युद्ध मे भले हि भीष्म ने कौरवो कि सेना का नेतृत्व किया परंतु विजय का आशीर्वाद पांडवो को दिया। जब युद्ध शुरू हुआ तो युधिष्ठिर ने स्वयं जाकर पितामह भीष्म का आशीर्वाद लिया। युद्धा के तीसरे दिन पितामह ने पांडवो कि सेना का खात्मा करना शुरू किया तो अर्जुन कमजोर पड़ गए। और अपनों के प्रति शस्त्र उठाने मे संकोच करने लगे। तभी श्री कृष्ण अपने सुदर्शन चक्र को लेकर आक्रोशित अवस्था मे रण क्षेत्र मे कूद पड़े,। परंतु अर्जुन ने उन्हे रोका और दृढ़ निश्चय के साथ भीष्म से युद्ध करना प्रारम्भ किया। जब भीष्म को हराने का कोई मार्ग नही दिखा तब पांडवो ने श्री कृष्ण से भीष्म कि मृत्यु का भेद पूछा। तब कृष्ण ने कहा ये तो सिर्फ भीष्म ही बता सकते है। पांचों पांडव श्री कृष्ण के साथ पितामह भीष्म से मिलने पहुँचे और उनसे उनकी मृत्यु का भेद पूछा तब उन्होने बताया कि युद्धा क्षेत्र मे तो ये मुमकिन नही है किसी और समय आना। रणक्षेत्र के बाद भीष्म ने बताया कि तुम्हारी सेना मे शिखंडी है जो कि इस जन्म मे पुरुष है लेकिन पिछले जन्म मे वो स्त्री था यदि युद्ध क्षत्र मे तुम उसे आगे कर दोगे तो मैं बाण नही चलाऊँगा। युद्ध के दशवे दिन अर्जुन ने शिखंडीको आगे कर भीष्म पर बाण साधा जिसके जवाब मे भीष्म ने कोई बाण नही चलाया और अर्जुन कि तीर पितामह कि छाती मे इस प्रकार घुस गयी मानो तीरो कि शय्या बिछी हो। परंतु भीष्म ने उस वक्त प्राण नही त्यागे क्योंकि उस वक़्त सूर्य दक्षिणायन मे था जो कि मोक्ष कि प्राप्ति मे बाधक साबित होता है इसलिए तीरो कि शय्या पर लेते हुए भीष्म ने पूरे 58 दिनो का इंतजार किया और सूर्य के उतरायन मे आने पर अपने प्राणो का त्याग किया। और उन्हे सभी सभी पापो से मुक्ति मिली।

इस प्रकार पितामह भीष्म ने इस ससांसरिक जीवन का त्याग कर मोक्ष प्राप्ति की ओर कदम बढ़ाए और युगो –युगो तक अमर हो गए।


यह भी पढ़ें - विनायक चतुर्थी पर कैसे करे बप्पा का स्वागत

(Updated Date & Time :- 2020-02-13 16:46:56 )


Gd Vashisht Enquiry

Comments

speak to our expert !

Positive results come with right communication and with decades of experience. Try for yourself about our experts by calling one of them
to feel the delight about understanding your problems, and in getting the best solution and remedies.

Astroscience