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कैसे हुआ माँ दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप का जन्म

कैसे हुआ माँ दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप का जन्म

दोस्तों जैसा की आप सभी जानते है कि भारतीय परंपरा और हिन्दू रीतिरिवाज़ों में नावतत्रो को कितना महत्व दिया जाता है। कहते है कि इन नौं दिनों में माँ दुर्गा अपने नौ रूपो का दर्शन देती हैं । तो आज इस लेख के माध्यम से हम जानेंगे कब से और क्यों की जाती है माँ दुर्गा के इन अलग अलग रूपो की आराधना। इस लेख में माँ ब्रह्मचारिणी के जन्म के संदर्भ में बात की जायेगी।
माँ ब्रह्मचारिणी पूजन कथा
माँ दुर्गा का यह स्वरुप परम सिद्धियों को देने वाला है। जिसमे ब्रह्म का अर्थ तप अथवा तपस्या है जबकि चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली, अतः माँ का यह स्वरूप पूर्णतः तप का आचरण करने वाला है। माता के इस दिव्य स्वरुप के एक हाथ में जप माला तथा एक हाथ में कमंडल सुशोभित है।
माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा के संदर्भ में जो कथा धार्मिक ग्रंथों में प्रचलित है उसके अनुसार पार्वती ने महादेव को पाने के लिए अत्यंत कठोर तप किया था। कहते है जब सती ने खुद को योगाग्नि में भस्म कर दिया था तब उन्होंने अगले जन्म में  पर्वतराज हिमायल के घर मे जन्म लिया और वहीं हिमालय की गुंफाओं मे बैठ कर अन्न जल का त्याग कर कठोर तपस्या मे लीन रही। 
पार्वती जी ने वहिं हिमालय पर ही स्थित एक गुफा मे एक पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया और इस मूरत की आराधना पूर्ण निष्ठा के साथ की। उन्होंने अन्न का त्याग कर सिर्फ फलों और साग पर निर्भर होकर हजारो वर्षो की तपस्या की उन्होंने एक समय में पतित्तयों तथा साग का भी त्याग कर दिया जिस कारण इनका एक नाम अपर्णा भी है।  कहा जाता है की इसी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने पार्वती को अपनी पत्नी के रूप मे स्वीकारा।  
इसी कठोर तपस्या के कारण ही माता का यह स्वरुप संसार में ब्रह्मचारिणी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 
इस लेख के माध्यम से हमने माँ दुर्गा के दूसरे स्वरुप माँ ब्रह्मचारिणी के पूजन की कथा को विधिपूर्वक बताया है । माँ दुर्गा के अन्य रूपो की कथा आगे के लेखों में पढ़ने को मिलेगी।


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(Updated Date & Time :- 2020-03-25 15:03:49 )


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