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महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने क्यों दिया “वेदो की ओर लौटने” का नारा

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने क्यों दिया “वेदो की ओर लौटने” का नारा

महर्षि दयानन्द सरस्वती जयंती – 18 फरवरी 2020

दिन – मंगलवार

प्रसिद्ध समाज सुधारक, आर्यसमाज के संस्थापक , और आधुनिक भारत के प्रणेता स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की जयंती इस वर्ष 18 फरवरी मंगलवार के दिन मनाई जाएगी। अँग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इनका जन्म 12 फरवरी 1824 को टंकारा मे हुआ था। मूल नक्षत्र मे पैदा होने के कारण इनका नाम मूलशंकर पड़ा। इनके पिता का नाम करशन जी लाल जी तिवारी तथा माता का नाम यशोदाबाई था। इनहोने अपने दिव्य ज्ञान से समाज मे व्याप्त कुप्रथाए जैसे (सती प्रथा ,पर्दा प्रथा, बाल विवाह) को जड़ से मिटाने का हर संभव प्रयास किया। वेदो का ज्ञान इन्हे स्वामी विरजा नन्द जी से प्राप्त हुआ। वेदो को कंठस्थ करने के पश्चात इन्होने लोगो को इससे जोड़ने का प्रयास किया और समाज मे नारा दिया।

“वेदो की ओर लौटो”

इनके द्वारा लिखी गयी पुस्तक “सत्यार्थ प्रकाश” मे सत्य को सर्वोत्तम माना गया है। कहा जा सकता है की......... “”सार्थकता वहीं होती है जहां सत्य होता है,सत्य वहीं होता है जहां तथ्य होता है, तथ्य वहीं होते है जहां दस्तावेज़ होते है और दस्तावेज़ वहीं होते है जहां इतिहास बनाता है””

और इसी इतिहास के पन्नो मे ऐसे महान व्यक्तियों को सहेज कर रखा है। । जहां एक ओर स्वामी दयानन्द जी ने अपने दिव्य प्रकाश से समाज मे ज्ञान रूपी दीपक जलाए रखा वहीं दूसरी ओर समाज मे व्याप्त बुराइयों को जड़ से मिटाने के लिए 1875 मे आर्य समाज की स्थापना भी की। आर्य समाज की स्थापना का एक मात्र कारण था की समाज मे नए विचारो का आगमन हो इसीलिए इस काल को पुनर्जागरण का काल भी कहा जाता है।

किस घटना ने तोड़ा मूर्तिपूजा का भ्रम

स्वामी दयानन्द जी बचपन से ही ईश्वर भक्ति मे लीन रहते थे। बचपन मे एक बार शिवरात्रि के दिन शिवलिंग की पूजा के लिए अपने पास के मंदिर मे गए थे। तभी उन्होने देखा की शिवलिंग के पास रखा प्रसाद चूहे खा रहे है। उसी वक़्त उनके बाल मन से यह आवाज आई की जब भगवान स्वयं अपने प्रसाद की रक्षा नही कर सकते तो वो आम जन मानस की रक्षा कैसे करेंगे। इसी घटना के बाद से ही मूर्ति पूजा से उनका विश्वास उठ गया और उन्होने निरंकारी ब्रह्म की उपासना प्रारम्भ की। इसी व्रत के कारण उन्होने मात्र 21 वर्ष की अवस्था मे सांसरिक जीवन का त्याग कर निरंकारी ब्रह्म की साधना शुरू की और ब्रह्मचर्य का व्रत धारण किया।

 

1857 की क्रांति मे स्वामी जी के विचारो ने किया मार्गदर्शन

भले ही 1857 की क्रांति पूर्ण रूप से सार्थक नही हो सकी परंतु इसने अँग्रेजी हुकूमत की जड़े हिला कर रख दी साथ ही आजादी की नींव रखी। सर्वप्रथम स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने ही “स्वराज”‘ का नारा दिया था जिसे बाल गंगाधर तिलक ने आगे बढ़ाया।

स्वामी जी ने ही अँग्रेजी हुकूमत द्वारा भारतियों पर हो रहे अत्याचारो के खिलाफ आवाज बुलंद करना शुरू किया और लोगो को जागरूक करने का जिम्मा अपने सर लिया वो कई हद तक कामयाब भी हुए।

उस वक़्त की क्रांति के नायक नाना साहब, रानी लक्ष्मीबाइ ,तात्या टोपे नाना साहब ,पेशवा बाजी राव स्वामी जी से अत्यंत प्रभावित थे। और जब इस क्रांति के प्रभाव कम पड़ते दिखाई पड़े तो नए संचार के साथ स्वामी जी ने लोगो का हौसला बढ़ाया और नई जंग के लिए तैयार होने को कहा।

उनके इसी मार्ग दर्शन और प्रेरणा से प्रभावित होकर भारत के लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कहा की .........................

“”भारत की स्वतन्त्रता की नींव वास्तव में स्वामी दयानन्द ने ही डाली थी।””

 

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के विचार

वेदो मे वर्णित ज्ञान ही अंतिम सत्य है। इसलिए प्रत्येक मानुषयक को आत्मज्ञान के लिए वादो का पाठ जरूरी है।

मनुष्य का शरीर नश्वर है। इसलिए अपने ज्ञान और विवेक से दूसरों को जागृत करो।

विवेक ही क्रोध का एकमात्र उपाय है। विवेक के बिना मनुष्य निर्दयी हो सकता है।  

आत्मा अपने स्वरुप में एक है, लेकिन उसके अस्तित्व अनेक हैं।

भगवान का ना कोई रूप है ना रंग है. वह अविनाशी और अपार है. जो भी इस दुनिया में दिखता है वह उसकी महानता का वर्णन करता है।

धन एक वस्तु है जो ईमानदारी और न्याय से कमाई जाती है. इसका विपरीत है अधर्म का खजाना।

वर्तमान जीवन का कार्य अन्धविश्वास पर पूर्ण भरोसे से अधिक महत्त्वपूर्ण है।

वह अच्छा और बुद्धिमान है जो हमेशा सच बोलता है, धर्म के अनुसार काम करता है और दूसरों को उत्तम और प्रसन्न बनाने का प्रयास करता है।

सबसे उच्च कोटि की सेवा ऐसे व्यक्ति की मदद करना है जो बदले में आपको धन्यवाद कहने में असमर्थ हो।

 

मृत्यु संबन्धित तथ्य

1883 मे स्वामी जी जोधपुर नरेश महाराज यशवंत से मिलने पहुंचे और अपने ज्ञान और बुद्धि से उन्होने राजा को ब्रह्म की उपासना का पाठ पढ़ाया। राजा यशवंत स्वामी जी से अत्यधिक प्रभावित हो गए थे।

तभी एक दिन स्वामी जी ने देखा की महाराज नन्ही जाननामक एक नर्तकी पर मोहित है और भोग विलास कर रहे है। इससे रुष्ट होकर स्वामी जी ने महाराज को इस असमाजिक और अनैतिक कृत्य से अवगत कराया साथ ही बताया की आप एक तरफ ब्रह्म की उपासना करते है और दूसरी तरफ ऐसे विलासितापूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे है। भोग विलास ही मोक्ष प्राप्ति मे बाधक साबित होता है। ऐसे कृत्यो से आप कभी ब्रह्म को प्राप्त नही कर सकेंगे।

महाराज को स्वामी दयानन्द जी की बात समझ आई और उन्होने उस नर्तकी से सभी संबंध खत्म कर दिये। परंतु इससे नन्ही जान मे द्वेष की भावना उत्पन्न हुई और उसने स्वामी जी के रसोइये के साथ मिलकर उनकी हत्या का षड्यंत्र रचा। उसने स्वामी जी के खाने मे शीशे का चूर्ण मिलाकर परोस दिया जिसे खाने के बाद स्वामी जी की तबीयत बिगड़ने लगी। जब इसकी जांच पड़ताल की गयी तो रसोईयें ने अपना गुनाह कबुल किया। परंतु विशाल हृदय वाले स्वामी दयानन्द जी ने उसे भी क्षमा कर दिया। और 30 अक्टूबर 1883 को उनकी मृत्यु हो गयी।


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(Updated Date & Time :- 2020-02-08 16:29:33 )


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