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पुराणों के अनुसार क्या है घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का रहस्य

पुराणों के अनुसार क्या है घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का रहस्य

धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से सृष्टि के आरंभ मे ब्रह्मा, विष्णु और महेश का योगदान सर्वाधिक रहा है। समस्त सिद्धियो को देने वाले महादेव कि आराधना सिर्फ मनुष्य और देवता ही नही अपितु वानर, दैत्य, गंदर्भ, असुर, तथा किन्नर भी करते है। शिव पुराण कि कोटीरूद्र संहिता के अंतर्गत महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों के महत्व को बताया गया है। जो कि भारत के अलग-अलग राज्यो मे स्थित है।
इस लेख मे हम जानेंगे कि आखिर क्या है इन ज्योतिर्लिंगों के स्थापना कि कथा साथ ही क्यों है इसकी इतनी महत्ता। इस लेख के माध्यम से हम घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग कि कथा को विधिपूर्वक बताने का प्रयास करेंगे।
 

घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा
यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के औरंगाबाद के नज़दीक दौलताबाद से करीब 11 किलोमीटर दूर स्थित है। इसके सन्दर्भ में जो कथा शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता के अंतर्गत मिलती है वह कुछ इस प्रकार से है। 
भारद्वाज गोत्र में जन्मे ऋषि सुधर्मा अपनी पत्नी सुदेहा के साथ देवगिरि पर्वत के निकट एक गॉव में रहा करते थे। उनकी कोई संतान नही थी जिस कारण उन्हें अपने आस- पड़ोस के लोगो के ताने सुनने को मिलते थे। इन सब से परेशान होकर ऋषि की पत्नी सुदेहा ने अपनी बहन घुश्मा का विवाह ऋषि सुधर्मा से करवा दिया। घुश्मा नित्य प्रति संतान की प्राप्ति हेतु सैकड़ो पार्थिव शिवलिंगों का निर्माण करती तथा पूजा के बाद उसे नदी में विसर्जित कर देती थी। महादेव की कृपा से घुमा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई । जिससे उसकी बहन सुदेहा के मन में द्वेष की भावना उत्पन्न होने लगी और वो मन ही मन अपनी बहन से ईर्ष्या करने लगी। धीरे धीरे समय गुजरता चला गया और उसके पुत्र का विवाह हो गया। घर में पुत्र वधु के आ जाने पर सुदेहा अपने आप को कुंठित समझने लगी और ईष्या की भावना  से उसका ह्रदय भरता चला गया। एक रात द्वेष के चलते ही सुदेहा ने घुश्मा के पुत्र की हत्या कर दी और उसके शव को उसी नदी में विसर्जित कर दिया जिसमें नित्यप्रति घुश्मा पार्थिव लिंगो का विसर्जन करती थी। जब सुबह पुत्रवधु अपने कक्ष में पहुंची तो वहां खून ही खून गिरा हुआ था। वह शोर मचाते हुए करुण विलाप करने लगी। उस वक़्त घुश्मा अपनी पूजा में लींन थी। पूजा के बाद ज्यों ही उसने पार्थिव शिवलिंगों का विसर्जन किया उसने देखा की उसका पुत्र वहिं नदी के पास ही खड़ा था। महादेव की कृपा से वह जीवित था। उसी समय महादेव ने घुश्मा को अपने दिव्य दर्शन दिए और उसे बहन सुदेहा के इस काण्ड के बारे में बताया। और सुदेहा को मृत्युदंड देना चाहा इस पर  घुश्मा ने महादेव से आग्रह किया कि वो बहन सुदेहा को क्षमा कर दें। उसके मुख से यह सुन महादेव अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने घुश्मा से वर मांगने को कहा।
घुश्मा ने कहा हे महादेव्..! अगर आप मेरी आराधना से प्रसन्न है तो इस समस्त संसार में लोक कल्याण के लिए कृपया आप इसी स्थान पर निवास करे और मेरे नाम से ही आपकी ख्याति हो इसी कारण भगवान् का यह स्वरुप संसार में घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुआ ।
ज्योतिर्लिंग की इस पूरी श्रेणी में हमने प्रत्येक ज्योतिर्लिंगों की कथा को विधिपूर्वक बताने का पूरा प्रयास किया है। जिसमें हमने पुराणों और वेदों से प्राप्त उल्लेखों को ही प्रमाण माना है। ज्योतिर्लिंगों के संदर्भ में ये आखिरी लेख है परंतु अध्यात्म से जुड़े ऐसे ही तमाम रोचक कथाओं को पढ़ने के लिए हमसे जुड़े रहे।


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(Updated Date & Time :- 2020-03-28 13:12:35 )


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