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पुराणों के अनुसार क्या है बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का रहस्य

पुराणों के अनुसार क्या है बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का रहस्य

धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से सृष्टि के आरंभ मे ब्रह्मा, विष्णु और महेश का योगदान सर्वाधिक रहा है। समस्त सिद्धियो को देने वाले महादेव कि आराधना सिर्फ मनुष्य और देवता ही नही अपितु वानर, दैत्य, गंदर्भ,असुर, तथा किन्नर भी करते है। शिव पुराण कि कोटीरूद्र संहिता के अंतर्गत महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों के महत्व को बताया गया है। जो कि भारत के अलग-अलग राज्यो मे स्थित है।
इस लेख मे हम जानेंगे कि आखिर क्या है इन ज्योतिर्लिंगों के स्थापना कि कथा साथ ही क्यों है इसकी इतनी महत्ता। इस लेख के माध्यम से हम बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग कि कथा को विधिपूर्वक बताने का प्रयास करेंगे।

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा
यह ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथधाम के नाम से भी जाना जाता है। यह महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों में शुमार नौवां ज्योतिर्लिंग है जो की झारखण्ड राज्य के (देवघर) संथाल परगना के अंतर्गत है। परंतु इसके स्थान को लेकर थोड़ा मतभेद है । द्वादश ज्योतिर्लिंगों में इसका स्थान महाराष्ट्र के परली नामक ग्राम में बताया गया है।
कहा जाता है कि एक बार लंकापति रावण ने महादेव को खुश करने के लिए उनकी घोर तपस्या की। परंतु उसकी तपस्या से महादेव प्रसन्न नही हुए। रावण ने फिर दूसरी विधि अपनाई परंतु इससे भी महादेव प्रसन्न नही हुए। जिससे चिंता में आकर रावण ने एक एक कर अपने ही सिरों की आहुति देनी शुरू कर दी। जैसे ही रावण ने अपना दशवा सर काटने के लिए प्रहार किया तभी महादेव वहां प्रकट हुए और अपने तेज़ से उन्होंने रावण के  सारे सर उसे लौटा दिए। और रावण से उत्तम वर मांगने को कहा। इसपे रावण ने संसार में सबसे अधिक बलवान होने का वर माँगा महादेव ने तथास्तु कहा। इसके साथ ही रावण ने कहा कि हे महादेव आप मेरे साथ मेरी सोने की लंका में विराजे। 

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इस पर महादेव आश्चर्य में पड़ गए थोड़ी देर सोचने के बाद बोले की हे लंकेश तुम मेरे दिव्य स्वरुप इस शिवलिंग को अपने साथ ले जाओ परंतु याद रहे की इसे ले जाते वक़्त इसे कहीं ज़मीन पर भूल कर भी मत रखना नही तो मैं उसी जगह स्थापित हो जाऊंगा। फिर क्या था रावण शिवलिंग लेकर चला गया पर मार्ग में एक चिताभूमि आने पर उसे लघुशंका निवृत्ति की आवश्यकता हुई। रावण उस लिंग को एक अहीर  जिस्ज नाम बैजनाथ भील था , को थमा लघुशंका-निवृत्ति करने चला गया। 
इधर ये अहीर शिवलिंग का वजन उठाने में असमर्थ रहा और उसने उसे जमीन पर रख दिया। जब रावण वापस आया तो वह लिंग उसी जगह पर स्थापित जो गया और रावण के अथक प्रयासों के बावजूद भी वह उसे नही हिला पाया। अन्ततः वह हार मान कर लंका लौट गया। शिवजी का दर्शन होते ही सभी देवी देवताओं ने उस स्थान पर शिव-स्तुति की और वापस स्वर्ग लौट गये यहीं कारण है की इस स्थान का नाम देवघर अर्थात देवताओं का घर पड़ा।  जनश्रुति व लोक-मान्यता के अनुसार यह वैद्यनाथ-ज्योतिर्लिग मनोवांछित फल देने वाला है।

इस लेख मे हमने बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग कि कथा का सार विधिपूर्वक बताया है। अन्य ज्योतिर्लिंगों के स्थापना संबन्धित कथाएँ आगे के लेख मे पढ़ने को मिलेगी।


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(Updated Date & Time :- 2020-03-23 20:03:44 )


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