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क्या है हिन्दू धर्म में वेदों का महत्व

क्या है हिन्दू धर्म में वेदों का महत्व

वेदों को दुनिया के  सर्व प्रथम ग्रंथों में गिना जाता है, इसी के आधार पर दुनिया के मजहबों की उत्पत्ति बताई गई है, जिन्होंने वेदों के ज्ञान को अपने-अपने तारीके से भिन्न-भिन्न भाषा में परिचारित किया है। वेद ईश्वर द्वारा ऋषियों को सुनाए गए ज्ञान पर आधारित है, इसलिए इसे श्रुति कहा गया है। सामान्य भाषा में वेद का अर्थ होता है – ज्ञान। वेद पुरातन ज्ञान का अथाह भण्डार है। इसमें मानव की हर समस्या का समाधान है। वेदों में ब्रह्मा यानि कि ईश्वर, देवता ब्रह्माण्ड, ज्योतिष, गणित, रासायन, औषधि, प्राकृतिक, खगोल, भूगोल, धार्मिक नियम, इतिहास, रिति-रिवाज आदि लगभग सभी विषयों से संबंधित ज्ञान भरा पड़ा है। शतपथ ब्राह्मण के श्लोक के अनुसार अग्नि वायु और सूर्य ने तपस्या की जिससे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं आथर्ववेद को प्राप्त किया। प्रथम तीन वेदों को अग्नि, वायु, सर्प अर्थात आदित्य से जोड़ा जाता है। आथर्ववेद को अंगिरा से उत्पन्न माना जाता है। ग्रथों के अनुसार ब्रह्मा जी के चारों मुखों से वेदों की उत्पत्ति मानी जाती है। वेदों को सबसे प्राचीनतम पुस्तकों की श्रेणी में रखा जाता है। इसलिए किसी व्यक्ति या स्थान का नाम वेदों पर से रखा जाना स्वाभाविक है जैसे की आज भी रामायण महाभारत में आयें सभी पात्रों का नाम वेदों के द्वारा ही किया गया है। वेदों का इतिहास मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेजों में निहित है। वेदों की 28000 पाण्डुलिपि है, जो कि विश्व की विरासत की रुप में संग्राहित है।

 

वेदों के प्रकार

ऋग्वेद  सबसे पहला वेद है जो स्थिति एवं ज्ञान पर पूरी तरह से आधारित है। इस वेद के 10 अध्याय है जिसमें 1028 सूक्त है, 11000 मंत्र है तथा इस वेद की 5 शाखाएं है। इस वेद में भौगोलिक स्थिति एवं देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ-साथ बहुत कुछ है। इस वेद में देवताओं को प्रसन्न करने की प्रार्थानाएं भी है तथा देवलोक की स्थिति में बारे में संपूर्ण वर्णन मिलता है। इस वेद में जल चिकित्सा, वायु चिकत्सा , सौर्य चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा की जानकारी भी दी गई है। इस वेद में दवाओं की जानकारी का भी जिक्र मिलता है।

वेदों की श्रेणी का यह दूसरा वेद है जिसे हम यजुर्वेद के नाम से जानते है। यजुर्वेद का अर्थ होता है गतिशील आकाश मतलब श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा हमें यजुर्वेद की द्वारा ही मिलती है। यजुर्वेद में यज्ञ की विधियाँ और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र है तथा यज्ञ के अलावा तत्व ज्ञान का भी वर्णन देखने को मिलता है।

सामवेद तीसरा वेद है जिसका  अर्थ होता है रुपांतरण संगीत, सौम्यता एवं उपासना । इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रुप है। सामवेद गीतात्मक यानि की गीत के रुप में है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। 1824 मंत्रों के इस वेद में 75 मंत्रों को छोड़ कर शेष सभी मंत्र ऋग्वेद से ही लिए गए है। इसमें सविता, अग्नि, इन्द्र देव के बारे में जिक्र मिलता है।

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चौथा वेद है अथर्ववेद जिसका अर्थ होता है अकंपन अर्थात ज्ञान से श्रेष्ठ कर्म करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहते है, वही अकंप बुद्धि को प्राप्त करते है तथा अंत में मोक्ष को प्राप्त हो जाते है  है। इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बुटियों, चमत्कार एवं आयुर्वेद आदि का वर्णन मिलता है। इसके 20 अध्यायों में 5687 मंत्र है तथा इस वेद के 8 खण्ड है।

 

वेदों का महत्व

वेदों की महिमा को अपरंपार बताया गया है, इनकी महिमा का जितना भी वर्णन किया जाए उतना ही कम है क्योंकि इनके महत्व और महिमा का बाखान करने के लिए इंसान की उम्र कम पड़ जायेगी और इसके बाद भी इनकी महिमा का उल्लेख पूरी तरह से नही कर पायेगा। आज हम थोड़ी से जानकारी इनके महत्व के बारे में बताते चलते है। जो कुछ प्रत्यक्ष ज्ञान द्वारा या अनुमान द्वारा या किसी अन्य तारीके से नही जाना जा सकता है, उसे भी सरलता से वेदों के द्वारा जाना जा सकता है। वेद ही हमारे संपूर्ण ज्ञान का मूल है। वेद शास्त्र को जानने वाले जाहे जिस आश्रम (अवस्था) में रहें, इस लोक में बैठे-बैठे ब्रह्मत्व को प्राप्त कर सकते है, यही वेद की महिमा है।


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(Updated Date & Time :- 2020-02-25 11:00:07 )


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