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क्या वेदों की ओर लौटाने का वक़्त आ गया है।

क्या वेदों की ओर लौटाने का वक़्त आ गया है।

वेदों की ओर लौटो यह नारा महान समाज सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने  तब के समय में समाज में व्याप्त कुंठित मानसिकता और हिन्दू धर्म में व्याप्त बहुत से पाखण्ड और काण्ड के निदान हेतु दिया था। 
उनका मानना था कि सभी धार्मिक ग्रंथों में से वेद ही एकमात्र ऐसा ग्रन्थ है जिसमे समस्त जीवन का सार निहित है। और इसके पाठन और वाचन के अतिरिक्त और किसी ज्ञान की आवश्यकता मनुष्य को नही है। इन सभी वेदों का ज्ञान प्राप्त करने के बाद ही उसमे निहित समस्त कार्यो को अपने निजी जीवन में उतारना और समाज के हर तबके तक इस ज्ञान का प्रसार करना ही इनका एकमात्र  उद्देश्य था। 
इसी कारण इन्होंने वेदों को घर घर पहुचने के लिए सत्यार्थ प्रकाश नामक एक पुस्तक का लेखन एवं संपादन किया और इसे समस्त भारतवर्ष में मुफ्त में वितरित भी किया।
जिनसे की अधिक से अधिक लोगो तक इसकी पहुँच हो सके। तो आखिर क्यों लोगों को देना चाहते थे महर्षि वेदों का ज्ञान आइये जानते है इस लेख के माध्यम से। 
प्राचीन काल में वर्णित चार वेदों का उल्लेख मिलता है जो की ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद है। ऋचाओं के क्रमबद्ध ज्ञान के संग्रह को ऋग्वेद कहा गया है। इसके अंतर्गत राजनीतीक प्रणाली, कौशल, भारत के महान इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है। 
इसलिए आज के समय में जरुरी है कि इसका अध्ययन प्रत्येक मनुषयो को जरूर करना चाहिए। वर्तमान समय की राजनितिक पार्टियों को इससे सीख लेनी चाहिए और शासन की एक ऐसी व्यवस्था को लागू करना चाहिए जो की पूर्ण रूप से साफ़ सुथरी और स्वच्छ हो।
सस्वर पाठ के लिए मंत्रो का संकलन यजुर्वेद में निहित है। चिकित्सा के क्षेत्र में सबसे असरदार आयुर्वेद का विधान भी इसी में निहित है। जिससे खतरनाक बिमारियों से बचाव के लिए जड़ी बूटियों और योग के महत्व को बताया गया है। जिसे आज के दैनिक जीवन में अपनाया जाए तो मनुष्य हमेशा के लिए रोगमुक्त रहेगा। 
लय और संगीतबद्ध ऋचाओं का संकलंन सामवेद कहलाता है इसमें अंतर्गत गीत ,संगीत और वादन का अद्भुत सार निहित है। जिसके गायन से कानो को तृप्ति मिलती है।
इसके साथ ही रोग निवारण, मंत्रोच्चारण, आशीर्वाद, स्तुति, प्रायश्चित, औषधि, अनुसंधान, विवाह, राजकर्म, मातृभूमि- महात्म्य आदि विविध विषयों से संबद्ध का वर्णन अथर्ववेद में दिया गया है।।
तो ये था समस्त वेदों का सार जिसे महर्षि दयानंद जी ने प्रत्येक जन को अपनाने के उपदेश दिया था । क्योंकि इसमें जीवन को सही तरीके से जीने के वें सभी ढंग बताएं गए हैं  जो की व्यक्ति के चरित्र में आदर्श का भाव उत्पन्न करता है। 
इस शास्त्र में धर्म, राजनीती, युद्ध, साम, दाम, दंड, भेद, चिकित्सा, नैतिकता, इंसानियत, रोग निवारण, मातृ भूमि प्रेम आदि सब कुछ बताया गया है। जो आज के समय में लोगो के अंतर्मन से ख़त्म होती जा रही है इसलिए अब समय आ गया है कि हमें अपनी पाठ्य पुस्तको में वेदों को सम्मिलित करना चाहिए और जितना हो सके इसका प्रचार प्रसार करना चाहिए जिससे ये समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच सके।


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(Updated Date & Time :- 2020-04-19 08:33:07 )


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