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पूर्ण कुम्भ एवं अर्ध कुम्भ मनाने का रहस्य और कथा

पूर्ण कुम्भ एवं अर्ध कुम्भ मनाने का रहस्य और कथा

पृथ्वी के आगामी कल्याण की सूचना देने के लिए या शुभ भविष्य के संकेत के लिए महाकाश में जब बृहस्पति आदि ग्रह जुटते है तो  हरिद्वार, प्रयागराज इत्यादि पुण्य स्थानों पर कुम्भ का आयोजन होता है। स्कंद पुराण में कहा गया है, कि जिस समय बृहस्पति कुम्भ राशि पर स्थित हो और सूर्य मेष राशि पर रहे उस समय गंगाद्वार यानि हरिद्वार कुम्भ योग होता है। पुराणों के अनुसार 12 कुम्भों की संख्या बताई गई है। जिसमें से चार मृत्यु लोक यानि की पृथ्वी पर तथा 8 देव लोक में बताए गये है।

भारतीय अध्यात्म में मोक्ष की कल्पना पूरी विश्व में भारतीय दर्शन को विशिष्ट स्थान दिलाती है। स्वार्थ एवं लालच से मुक्ति ऋषि महर्षि मानव कल्याण एवं उच्च आदर्शों की स्थापना के उद्धेश्य में लीन साधु संत तथा विद्वान जनों के आचार-विचार से ही राजा और प्रजा प्रेरित होकर आंदन पूर्वक अपना जीवन यापन किया करते थे। इन पुण्य पर्व में सद् विचारों का आदान-प्रदान समाज को नवीन चेतना देने, देश काल एवं वातावरण पर धार्मिक महत्ता का वर्चस्व स्थापित करने , आत्मियता एवं धार्मिक सौहाद्र का वातावरण तैयार करने में सहायता मिलती है।

ऐसे पुण्य आयोजनों के लिए शुद्धता की दृष्टि से, वातावरण की दृष्टि से, बड़े आयोजनों की सुविधा की दृष्टि से तथा राजनैतिक दबावों से मुक्त विचारों की स्वातंत्रता की दृष्टि से गंगा आदि नदियों के तटों तथा प्रयाग, हरिद्वार आदि पवित्र स्थलों पर ज्ञान सत्रों का आयोजन कर धर्म चर्चा का अवसर बनाया जाता रहा है। यही हमारे सनातन धर्म की परंपरा रही है। कुम्भ पर्व के संबंध में वेदों में अनेक महत्व पूर्ण मंत्र मिलते है। जिनसे सिद्ध होता है कि कुम्भ पर्व अत्यंत प्राचीन और वैदिक धर्म से ओत-प्रोत है।

कुम्भ पर्व में जाने वाला मनुष्य अपने सत् कर्मों के फल स्वरुप, अपने पापों को वैसे ही नष्ट करता है जैसे कुठार बन को काट देता है, जैसे गंगा नदी अपने तटों को काटती हुई प्रवाहित होती है। उसी प्रकार कुम्भ पर्व मनुष्य की पूर्व संचित कर्मों से प्राप्त हुए शरीरिक पापों को नष्ट कर देता है।

 

महा कुम्भ की अमर कथा

हमारे शास्त्रों में लिखा है कि - हे! कुम्भ देव, देवताओं और दावनों के विवाद के कारण समुद्र का मंथन किए जाने पर तुम्हारी उत्पत्ति हुई। जिसे साक्षात भगवान विष्णु ने धारण किया, तुम्हारे जल में समस्त तीर्थ, समस्त देवता, समस्त प्राणी ये सभी स्थित रहते है। कुम्भ के बारे में कहा गया है कि कुम्भ साक्षात शिव, विष्णु और ब्रह्मा है।

एक समय कि बात है कि दैत्यौ-दानवों ने बहुत बड़ी सेना लेकर देवताओं पर चढ़ाई कर दी थी। उस युद्ध में दैत्यों के सामने देवता परास्त(हार) हो गये। तब इन्द्र आदि संपूर्ण देवता क्षीर सागर में उत्तर तट पर गये और भगवान वासुदेव को संबोधित कर बोले – विष्णु आपकी सहायता न मिलने से दानव उन्हें बार-बार परास्त कर रहे है। उनके ऐसा कहने पर कमल के समान नेत्र वाले भगवान अंतर्यामी पुरोषोत्तम ने देवताओं की अवस्था देखकर कहा – देवगण ! मंदराचल पर्वत का मथानी और वासुकी नाग को नेती (रस्सी) बनाकर समुद्र का मंथन करते हुए उससे अमृत निकालो और उसका पान करने से तुम सब, बलवान एवं अमर हो जाओगे भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता, दैत्यो के साथ संधि (समझौता) करके अमृत निकालने के यत्न (प्रयास) में लग गये।

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मंदिराचल पर्वत मंथन दंड था, वासुकी नेकी थे तथा कच्छप रुप धारी भगवान मंदराचल के पृष्ठभाग (आधारशिला) थे। भगवान विष्णु उक्त मंथन दंड को पकड़े हुए थे। क्षीर सागर से 14 रत्न  - हलाहल विष, घोड़ा ( उच्चैश्रवा) , ऐरावत, कौस्तुभ मणि, कामधेनु, कल्पवृक्ष, देवी लक्ष्मी, अप्सरा रंभा, पारिजात, वारुणी देवी, पंचजन्य शंख, चंद्रमा, धन्वंतरि देव एवं अमृत कुम्भ निकले और अमृत कुम्भ निकलते ही देवताओं के संकेत अनुसार इन्द्र पुत्र जयंत अमृत कलश को लेकर उड़ गया। उसके बाद दैत्य गुरु शिकराचार्य के आदेश के अनुसार दैत्यों ने अमृत कलश को पाने के लिए जयंत का पीछा करना शुरु कर दिया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंन बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ लिया इसके बाद अमृत कलश पर अपना अधिकार जमाने के लिए देवताओं और दानवों में 12 दिनों तक अविराम युद्ध होता रहा। इस मारकाट के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक आदि जगहो पर कलश का अमृत गिरा था। शास्त्रों के अनुसार देवताओं के 12 दिन मनुष्यों के 12 वर्षों के बराबर होते है, इसलिए कुम्भों की संख्या 12 बताई गई है और इनमें से केवल चार ही मृत्यु लोक अर्थात पृथ्वी पर होते है, बाकी के 8 कुम्भ देवलोक में ही होते है जिन्हे देवता गण ही प्राप्त कर सकते है।

 

पूर्ण कुम्भ एवं अर्ध कुम्भ मनाने का रहस्य

समस्त जन समाज दूर-दूर से प्रयाग आदि पवित्र तीर्थों में आकर गंगा स्नान से पवित्र होकर श्रेष्ठ विद्धानों के उपदेशों को प्राप्त करते है तथा तप, सत्य, दान , यज्ञ आदि शुभ कार्यों का यथाधिकार आचरण करें, जिससे मृत्यु के बाद हमें उत्तम या मध्यम गति प्राप्त हो और अधम गति कतई प्राप्त न हो।

 

वर्ष 2021 में हरिद्वार पर पड़ने वाले शादी स्नानों का आयोजन इस प्रकार है

वर्ष 2021 में होने वाले महाकुम्भ के शाही  स्नानों की घोषणा अखाड़ा परिषदों के द्वारा कर दी गई है और इस बार महाकुम्भ में कुल 10 स्नान होंगे जो 14 जनवरी से 27 अप्रैल तक होंगे। इन दस स्नानों में 4 स्नान पर्वों को शादी स्नान पर्व का दर्जा दिया गया है। हरिद्वार महाकुम्भ का पहला शाही स्नान 11 मार्च महाशिरात्रि के दिन होगा तथा इस महाकुम्भ का दूसरा शाही स्नान 12 अप्रैल सोमवती अमावस्या को होगा, तीसरा शादी स्नान 14 अप्रैल मेष संक्रांति को मनाया जायेगा तथा 27 अप्रैल चैत्र पूर्णिमा को आखिरी शाही स्नान सम्पन्न होगा।

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महाकुम्भ का महात्म -

सनातन संस्कृति में कुम्भ पर्व का बहुत बड़ा महत्व होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहों की स्थिति इस प्रकार हो जाती है कि हरिद्वार में बह रही माता गंगा का पानी अमृत के समान हो जाता है, जो मनुष्य कुम्भ पर्व में गंगा स्नान करता है उसे उसके पापों से मुक्ति मिलती है, साथ ही रोगों से भी छुटकारा प्राप्त होता है। क्योंकि की महाकुम्भ के दौरान गंगा का जल औषधिकृत हो जाता है, जिसमें रोगों और बीमारियों से लड़ने की पूरी क्षमता होती है। इसी उद्देश्य से भारत एवं भारत के बाहर के श्रद्धालु कुम्भ में स्नान करने तथा अपनी-अपनी मनोकामनाओं की पूर्ती के लिए आते है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाएं तो कुम्भ के दौरान नक्षत्र मण्डल के ग्रहों की स्थिति इस प्रकार हो जाती है कि यह कुम्भ का पर्व एकाग्रता एवं ध्यान साधना के लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त होती है। संपूर्ण जगत के सनातनि श्रद्धा एवं भक्ति के साथ कुम्भ पर्व  में गंगा में डुबकी लगाते है।

 

कुम्भ स्नान के बाद क्या करना चाहिए और क्या नही

हिन्दू धर्म के शास्त्रों के अनुसार कुम्भ स्नान करने के बाद अपने समर्थ के अनुसार गरीबों एवं ब्रह्माणों को दान देना चाहिए। कुम्भ में स्नान करने के बाद प्रातः वंदना एवं संध्या काल की वंदना अवश्य करनी चाहिए।अपने साम‌र्थ्य के अनुसार कलश (सोने, चाँदी, पीतल,तांबा) किसी भी धातु का हो उसमें घी, मिठाई, फल, वस्त्र, इत्यादि भरकर किसी सुपात्र ब्रह्माण को दान करना चाहिए। इस दान को कुम्भ दान कहा जाता है और शास्त्रों की मान्यता के अनुसार यदि जो भी व्यक्ति इस तरह का दान करता है उसे सैकड़ो गायों (गौ ) दान करने के बराबर फल मिलता है।

कुम्भ स्नान करने के बाद किसी से भी किसी प्रकार को झूठ, छल , कपट नही करना चाहिए तथा कुम्भ के पवित्र स्नान के बाद किसी के ऊपर कोई गुस्सा नही करना चाहिए। किसी भी प्रकार के मांस-मदिरा का सेवन नही करना चाहिए। आपकी यही कोशिश होनी चाहिए कि भूलकर भी आपके द्वारा किसी को परेशानी नही होनी चाहिए और न ही किसी प्रकार का किसी के ऊपर दवाव बनाना चाहिए अन्यथा आपके कुम्भ स्नान का फल नगण्य हो जाता है।


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(Updated Date & Time :- 2020-02-13 12:04:07 )


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