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महादेव ने कैसे किया ब्रह्मा और विष्णु के अहंकार का अंत

महादेव ने कैसे किया ब्रह्मा और विष्णु के अहंकार का अंत

धार्मिक ग्रंथो और पुराणो से ज्ञात होता है कि आज के दिन महादेव और आदि शक्ति पार्वती का मिलन हुआ था। कहा जाता है कि महादेव को पाने के लिए पार्वती ने 107 बार जन्म लिया था। परंतु किसी भी जीवन मे महादेव को अपने पति के रूप मे नही पा सकी। 108वीं बार जन्म लेने पर कठोर तप और उपवास के बाद स्वयं भोलेनाथ ने पार्वती को अपनी भार्या के रूप मे स्वीकारा था। जिसे प्रतीक के रूप मे पूरे भारत वर्ष मे महाशिवरात्री के पर्व का आयोजन किया जाता है। जिसमे शिव बारात निकाली जाती है। परंतु जहां तक बात कि जाए शिव पुराण की तो उसके अनुसार जब सृष्टि का सृजन हुआ तो क्षीर सागर से भगवान विष्णु प्रकट हुए। तत्पश्चात उनकी नाभि से कमल खिला जिससे ब्रह्मा जी प्रकट हुए। अब ऐसी स्थिति मे दोनों मे अपने आप को महान सिद्ध करने का द्वंद क्षीण गया। दोनों ही अपने आप को दूसरे से ज्यादा महान बताने की होड़ मे लग गए। इतना ही नही झगड़ा इतना बढ़ गया की युद्ध की स्थिति पैदा हो गयी। तभी अचानक से दोनों के बीच एक दिव्य अग्नि स्तम्भ प्रजावलित हो उठी। जिसे देख कर दोनों आश्चर्यचकित रह गए।

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इस अग्नि कुंड का मूल ढूँढने के चलते भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण किया और पाताल लोक कि ओर चले गए जबकि ब्रह्मा ने हंस पर सवार होकर आकाश लोक की ओर जाना उचित समझा। बहुत प्रयत्नो के बावजूद दोनों को इस दिव्य अग्नि स्तम्भ का मूल न मिला तो वो दोनों ही अपनी हार स्वीकार कर वापस लौट आए। अब तक दोनों का अहंकार चूर-चूर हो चुका था। इस पराजय को स्वीकार कर ब्रह्मा और विष्णु दोनों ने उस दिव्य अग्नि स्तम्भ को प्रणाम किया और उनसे दर्शन देने का आग्रह किया। ऐसा उल्लेख है की उसी दिन उस दिव्य प्रजावलित स्तम्भ से भगवान शिव ने अपने दर्शन दिये। महादेव ने दोनों को समझाते हुए कहा की इस संसार मे कोई बड़ा या छोटा नही है इसलिए आप दोनों का झगड़ा व्यर्थ है। सृष्टि के सृजन से अंत तक तीनों देवो का अपना-अपना स्थान और महत्व है।जिसे किसी पैमाने से नापा नही जा सकता।

जनश्रुति है कि महाभारत के समय समुद्र मंथन से जो काल कूट विष निकला उसे भगवान शिव ने सृष्टि के समस्त प्राणी जगत की रक्षा के लिए स्वयं ग्रहण किया और इसी दिन से भोलेनाथ नीलकंठ कहलाए।


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(Updated Date & Time :- 2020-02-21 15:43:27 )


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