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संतान सुख में विलम्ब के संयोग, जाने क्या कहते है ग्रहो के योग

संतान सुख में विलम्ब के संयोग, जाने क्या कहते है ग्रहो के योग

हर विवाहित दम्पति का ये सपना होता है कि उसके गोद में भी बाल गोपाल खेले।हिन्दू मान्यताओं के अनुसार बच्चो को ईश्वर का अवतार माना जाता है।विवाह के बाद हर दम्पति को यह सुख भोगने का अधिकार है।जिसमे से अधिकतर दंपत्ति को यह सुख बिना किसी रुकावट के प्राप्त हो जाता है परंतु बहुत से ऐसे विवाहित दंपत्ति है जिनको संतान सुख बहुत देर से प्राप्त होता है अथवा जीवनपर्यंत वो इस सुख से वंचित रह जाते है।ऐसा उनकी कुंडली में उपस्थित विभिन्न नक्षत्रीय दशाओं के योग के कारण होता है।

संतान सुख में विलम्ब या वंचित होने के क्या है कारण -

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसे अनगिनत योग है जिससे किसी वैवाहिक दंपत्ति का जीवन संतान सुख से वंचित रह जाता है। जिसका जिक्र गुरुदेव जी. डी वशिष्ठ द्वारा लिखित "लाल किताब" में भी संपूर्ण रूप से किया गया है।

जिसके कुछ अंश इस प्रकार से है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली में पांचवा भाव संतान का होता है परंतु पाँचवे भाव में कोई अशुभ ग्रह उपस्थित हो फिर भी संतान की प्राप्ति होती है।लेकिन यदि पांचवे भाव में किसी भी ग्रह की उपस्थिति न हो और अन्य दूसरे भाव में विराजमान अशुभ ग्रहों का प्रभाव उस पर पड़ रहा हो तो ऐसी स्थिति में स्त्री संतान सुख से वंचित रह जाती है।

पांचवे घर में यदि अशुभ ग्रह उपस्थित हो तो औलाद होकर भी जीवन भर उसे तकलीफ़ो का सामना करना पड़ता है जो की पहले पिता को हानि पहुँचाता है या उनकी मृत्यु का भी कारण बनता है। उसके बाद औलाद के जीवन पर बुरा प्रभाव डालता है।

जिनके घर में सुख समृद्धि होती है जो अपने परिवार, माता- पिता तथा पत्नी का सम्मान करते है। अपने रिश्तेदारों के प्रति अच्छा भाव रखते है ऐसे लोगो के शुक्र ग्रह दूसरे भाव में होते है। जिसके कारण ये लोग आर्थिक रूप से भी समृद्ध होते है परंतु इनके दूसरे भाव का शुक्र औरत को बाँझ बना देता है। और वे दंपत्ति संतान सुख से वंचित रह जाते है।

क्या है उपाय -

ऐसे लोगो को तैतालिस दिनों तक लगातार दो किलो आलू हल्दी से पीले करके गाय को खिलाना चाहिए। जल्दी ही संतान प्राप्ति के योग बनेंगे।

कुण्डली में यदि चंद्रमा लग्न में हो या एकादश भाव में उपस्थित हो और ऐसे बच्चो की शादी यदि अधिक उम्र में होती है (27 से 28 वर्ष में) तो इस स्थिति में औरत के अंडे तथा आदमी के शुक्राणु कमजोर होने की दशा में संतान उत्पन्न नही हो पाती है। ऐसे लोगों में दिखावे की आदत होती है। और यदि वे अपना कोई काम शुरू करते है तो बार- बार उन्हें असफलता ही मिलती है।

एक सोने की सुई को गैस पर गर्म (लाल) करने के पश्चात सुई की नोक को एक गिलास दूध में ग्यारह बार डूबा दे . दंपत्ती इस दूध का सेवन करेे। सवा महीने के भीतर संतानोत्पत्ति के योग बनेंगे।

कुण्डली में यदि शुक्र छटे भाव मे हो या नौंवे भाव में उपस्थित हो और ऐसी दशा में यदि स्त्री के योनि या उसके आप पास के स्थान में किसी प्रकार का संक्रमण है । तब शुक्राणु और अंड का मिलन नही हो पाता है संक्रमण के कारण कीटाणु पहले ही शुक्राणु को नष्ट कर देते है और यदि अंड और और शुक्राणु का मिलन हो भी जाये तो ऐसी स्त्रियों को अर्ध विकसित बच्चे पैदा होते है।

चुकि शुक्र की दशा के कारण यह स्थिति उत्पन्न होती है। सबसे पहले इस संक्रमण को दूर करना आवश्यक है। इसके लिए दो से तीन महीने तक स्त्री रोजाना पानी में कुछ बूंदे लाल दवा (जो फोड़े फुंसी पर लगाई जाती है) उसका प्रयोग करे उसके बाद सम्भोग से  गर्भ ठहरने की संभावना बनेगी।

कुंडली के भीतर यदि मंगल और केतु का मेल यदि ख़राब भाव में बैठा हो तो ये दशा वंश के नस्ल बंद होने का संकेत देती है।इस योग केे व्यक्ति काम - काज में तो अच्छे होते है लेकिन लड़ने - झगड़ने में भी उतने ही माहिर भी होते है।

ऐसे लोग जिनके कुंडली में मंगल और केतु का मेल यदि अशुभ भाव में बैठा हो तो सात प्रकार के फल जिसमे से एक को ज्वार के साथ तथा अन्य सभी को सात तरह के पानी (जैसे गंगा जल,घर का पानी,तालाब का पानी, दूध इत्यादि) से धोकर जमीन के नीचे दबा दे। दोष से मुक्ति मिलेगी।

इसी प्रकार की अनेक समस्याओं तथा उनके समाधान के लिए गुरुदेव जी. डी. वशिष्ठ द्वारा लिखित "लाल किताब अमृत" में वर्णित मूल उपायों को अपनाकर विभिन्न दोषों से निजात पाया जा सकता है।


(Updated Date & Time :- 2019-12-30 10:48:38 )


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