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पुराणों के अनुसार क्या है 12 ज्योतिर्लिंगों का रहस्य

पुराणों के अनुसार क्या है 12 ज्योतिर्लिंगों का रहस्य

धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से सृष्टि के आरंभ मे ब्रह्मा, विष्णु और महेश का योगदान सर्वाधिक है। समस्त सिद्धियो को देने वाले महादेव कि आराधना सिर्फ मनुष्य और देवता ही नही अपितु वानर, दैत्य, असुर, तथा किन्नर भी करते है। शिव पुराण के अंतर्गत महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों के महत्व को बताया गया है। जो कि भारत के अलग-अलग राज्यो मे स्थित है। इस लेख मे हम जानेंगे कि आखिर क्या है इन ज्योतिर्लिंगों के स्थापना कि कथा साथ ही क्यों है इसकी इतनी महत्ता। इस लेख के माध्यम से हम सोमनाथ मे स्थित ज्योतिर्लिंग कि कथा को विधिपूर्वक बताने का प्रयास करेंगे।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग

सर्वप्रथम शिव पुराण कि कोटिरूद्र संहिता के अंतर्गत सोमनाथ मे स्थित ज्योतिर्लिंग को प्रथम ज्योतिर्लिंग कि संज्ञा दी गयी थी। जो कि गुजरात राज्य के सौराष्ट्र मे स्थित है। इसकी स्थापना के संदर्भ मे एक कथा प्रचलित है जो कि इस प्रकार से है। राजा दक्ष ने अपनी 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से करवा दिया था। जिससे ये सभी बहने चन्द्र को अपने पति के रूप मे पाकर अत्यंत प्रसन्न थी। परंतु चंद्रमा इन सभी 27 बहनो मे रोहिणी से अत्यंत प्रेम करते थे और उन्हे ही अपनी रानी कि पदवी देते थे। चन्द्र केइस व्यवहार से रुष्ट होकर बाकी सभी रानियों ने अपने पिता राजा दक्ष से इसकी शिकायत कि परंतु बहुत समझाने के बाद भी चन्द्र ने और किसी भी रानी को अपनी भार्या के रूप मे पदवी नही दी। जिससे क्रोध मे आकार राजा दक्ष ने चन्द्र को श्राप दे दिया कि तुम्हें अपने सौंदर्य पर इतना गुरूर है इसलिए मैं तुम्हें क्षय रोग का श्राप देता हूँ। श्राप के प्रभाव से चंद्रमा क्षय रोग से ग्रसित हो गए। उनके क्षीण होते ही सर्वत्र हाहाकार मच गया।

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सभी देवता और ऋषि गढ़ भी चिंता कि अवस्था मे आ गए। तब सभी देवता सहायता के लिए ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया कि जो घटना घटित हो चुकी है उसे तो भुगतना ही पड़ेगा क्योंकि दक्ष के निश्चय को पलटा नही जा सकता है। परंतु इसके उन्मूलन का एक उपाय है कि यदि चन्द्र समस्त देवो सहित कल्याणकारी शुभ प्रभा क्षेत्र मे चले जाये और वहाँ जाकर पूरे विधि विधान से महामृतुंजय मंत्र का जाप करते हुए पूरी श्र्द्धा से महादेव कि आराधना करे फिर अपने समक्ष शिवलिंग कि स्थापना कर प्रतिदिन कठोर तपस्या करे और जब इनकी आराधना से भोले नाथ प्रसन्न हो जाएंगे तो वो इन्हे क्षयरोग से मुक्त कर देंगे।

ब्रह्मा जी द्वारा सुझाए मार्ग पर चलकर सभी देवताओ समेत चन्द्र प्रभास क्षेत्र मे पहुँच गए। जहां वे महामृतुंजय मंत्र का जप करने और भगवान शिव कि उपासना मे लीन हो गए। छः महीनो कि कठोर तपस्या और दस करोड़ मृतुंजय मंत्र के जप के परिणामस्वरूप महादेव ने स्वयं प्रकट होकर चन्द्र को दर्शन दिये। और उन्होने चंद्रमा से उत्तम वर मांगने को कहा। तब चंद्रमा ने प्रार्थना करते हुए कहा कि हे देवेश्वर आप मेरे द्वारा किए गए सभी पापो को क्षमा करे तथा मेरे इस शरीर को क्षय रोग से मुक्त करे। तब महादेव ने कहा कि हे चन्द्र देव! तुम्हारी कला प्रतिदिन एक पक्ष मे क्षीण हुआ करेगी जबकि दूसरे पक्ष मे वह निरंतर बढ़ती ही रहेगी। इस प्रकार तुम स्वस्थ्य और लोक सम्मान के योग्य हो जाओगे। तब चंद्रदेव ने पूरी भक्ति भाव से ओत- प्रोत होकर भगवान शिव कि स्तुति कि ऐसी स्थिति मे निराकार शिव उनकी भक्ति भाव को देख कर साकार लिंग रूप मे प्रकट हुए और संसार मे सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुए। इसी जगह पर सभी देवताओ ने सोमनाथ कुंड कि स्थापना की।

कहा जाता है कि इस कुंड मे साक्षात ब्रह्मा और महेश का निवास है। इसलिए गुजरात समेत पूरे भारत भर के लोग यहाँ दर्शन करने आते है।

इस लेख मे हमने सोमनाथ ज्योतिर्लिंग कि कथा का सार विधिपूर्वक बताया है। अन्य ज्योतिर्लिंगों के स्थापना संबन्धित कथाएँ आगे के लेख मे पढ़ने को मिलेगी।


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(Updated Date & Time :- 2020-02-26 10:47:33 )


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