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शनि देव कब देते हैं शुभ और अशुभ फल

शनि देव कब देते हैं शुभ और अशुभ फल

ज्योतिष के सभी नवग्रहों में से शनि देव की भुमिका सबसे महत्व पूर्ण होती है। हिन्दू धर्म के शास्त्र कहते है कि यह ग्रह एक न्यायाधीश के पद का पूरी तरह से पालन करता है, जिस प्रकार न्यायाधीश सही-गलत के अंतर को समझकर गलत करने वाले व्यक्ति को सजा सुनाता है उसी प्रकार शनिदेव भी गतल करने वाले के साथ बहुत ही बुरा करते है अर्थात उसे उसके बुरे कार्मों की सजा का निर्धारण करते है। शनि देव को न्यायाप्रिय देवता कहा जाता है और शनि देव हमेशा सच का साथ देते है। शनि देव एक ऐसे ग्रह है जो एक फकीर को राजा बना सकते हैं और राजा को फरीक बनाने में इन्हें बिल्कुल समय नही  लगता है, यही कारण है कि लोग शनि देव का नाम सुनते ही कांपने लगते है। शनि देव को लेकर हमारे मन में एक बहुत बड़ी भ्रांति फैली हुई है, कि शनि देव हमेशा बुरा ही करते है, क्या इस भ्रांति में कहीं तक सच्चाई  है? क्या वास्तव में शनि देव बुरा करते है? क्या शनि देव हमेशा सबका अहित ही चाहते है?

 

शनि देव की अशुभता की निशानी एवं अशुभ फल

शनि अर्थात धीरे-धीर चलना और जब शनि देव जन्म कुण्डली के लग्न में आते है तो वह आपके जीवन के  संचालक के रुप में कार्य करते है, जिससे आपके कार्यों में भी धीमापन आ जाता है और आप अपने कार्यों को भी मंद गति के साथ करना पसंद करने लगते है या आपकी कार्य करने की क्षमता कमजोर हो जाती है, हर बात को हमेशा सोचते ही रहते है, शरीर में आलस्य बढ़ जाता है। आपके कार्यों की जो सामान्य गति होनी चाहिए उससे भी कम गति से आप कार्य करते है। अगर इस तरह  के संकेत किसी में दिखाई दे रहे है तो यह शनि देव की नीचता की निशानी होती है।

शनि देव जब लग्न में मेष राशि में हो तो जातक के अंदर नकारात्मक सोच, दूसरो के ऊपर निर्भर होना, दूसरो को आदेश देने की प्रवृत्ति आ जाती है। जब कोई व्यक्ति अपने दैनिक कार्यों को नियमित रुप से संचालित नही कर पाता यानि की न तो समय से नहाना, न समय से भोजन करना, न समय पर सोना-जागना इत्यादि यह सब बिगड़ जाता है तो शनि अपने नीच प्रभाव जातक के ऊपर दिखा रहे होते है।

शनि और सूर्य दो विपरीत ग्रह है एक प्रकाश है तो दूसरा अंधकार है। जब यह दोनो अगर आपस में टकराते है  तो कहीं न कहीं संध्या (छाव) का प्रवेश होता है। जिसे राहु कहा गया है, जो मंगल बद भी बन जाता है। अब शनि के साथ कहीं न कहीं तालमेल बनाते है, उसमें कमी देखने को मिलने लगती है। राहु की यह छाया उदासीनता, नकारात्मकता पैदा करती है। उसके लिए एक उदारण लेते है जैस जब शाम होती है तो हर कोई अपने घर तो लौटने की सोचता है और हर कोई शाम के समय अपने काम को अंतिम रुप प्रदान करता है। यह सभी करते है जैसे – पक्षी, जीव, जंतु यह सब अपने-अपने घरो में जाना शुरु हो जाते है। उसी प्रकार से नई ऊर्जा खत्म हो जाती है और व्यक्ति अब आराम की ओर बढ़ने लगता है, क्योंकि जो रात का समय होता है वह आराम करने का समय होता है, दिन होता है वह काम करने के लिए होता है और जो संध्या होती है वह काम का बंद करने का संकेत देती है।  यह तो हो गई शनि देव की अशुभता कि कब शनि देव अशुभ फल देते है।

 

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कब देते है शनि देव शुभ फल

ज्योतिष शास्त्र का मानना है कि जिन जातकों के ऊपर शनि की साढ़ेसाती चलती है और उसी दौर में जातक के ऊपर शनि देव की कृपा बनी रहती है अर्थात शनि देव उसकी जन्म कुण्डली में शुभ होकर बैठे होते है तो उन्हें किसी भी चीज  की, कोई भी कमी नही होती है। ऐसे व्यक्तियों के जीवन में सुख, समृद्धि, धन, दौलत, मान-सम्मान इत्यादि का जीवन में कभी अभाव नही होता है। जातक की जन्म कुण्डली में जब किसी ग्रह की दशा अथवा महादशा चल रही होती है और साथ में शनि की साढ़ेसाती का भी प्रभाव होता है तो तब भी शनि देव कुछ न कुछ अच्छे ही परिणाम देते है। इस तरह के लोगों को सफलता तो जरुर मिलती है परंतु कुछ समय लग सकता है।

किसी जातक की जन्म कुण्डली में शनि देव तीसरे, छटवें, आठवें एवं बारहवें भाव में उच्च के होकर बैठे हो तो ऐसे जातको पर शनि देव का बुरा नही मिलता, भलेही शनि की साढ़ेसाती ही क्यों न चल रही हो। इसके साथ-साथ किसी भी व्यक्ति की जन्म कुण्डली में चन्द्रमा मजबूत स्थिति में बैठा हो तो ऐसे व्यक्तियों पर शनि की साढ़ेसाती का कोई भी बुरा प्रभाव नही पड़ता है, बल्कि शुभ फल ही प्राप्त होते है। शनि देव मकर तथा कुम्भ राशि के स्वामी है और यह तुला राशि में उच्च के माने जाते है, इस स्थिति में इन तीन शनि पर साढेसाती होने के बावजूद भी इन पर शनि का कोई भी बुरा प्रभाव नही पड़ता है।


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(Updated Date & Time :- 2020-02-14 11:20:08 )


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