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कैसे हुआ माँ दुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरूप का जन्म

कैसे हुआ माँ दुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरूप का जन्म

दोस्तों जैसा की आप सभी जानते है कि भारतीय परंपरा और हिन्दू रीतिरिवाज़ों में नवरात्रो को कितना महत्व दिया जाता है। कहते है कि इन नौं दिनों में माँ दुर्गा अपने नौ रूपो का दर्शन देती हैं । तो आज इस लेख के माध्यम से हम जानेंगे कब से और क्यों की जाती है माँ दुर्गा के इन अलग अलग रूपो की आराधना। इस लेख में माँ दुर्गा के माँ महागौरी स्वरुप के जन्म के संदर्भ में बात की जायेगी।
 

माँ सिद्धिदात्री कथा
नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है. माता का यह स्वरूप अत्यंत ही सुंदर और स्वर्ण दिखाई पड़ता है. कहते हैं कि माता का  यह स्वरुप अपने भक्तों को परम सिद्धियों देने वाला होता है.
मार्कंडेय पुराण के अनुसार, अणिमा महिमा लघिमा गरिमा  प्राप्ति, प्राकाम्य  इशिता और वशिता  यह आठ सिद्धियां हैं. माँ सिद्धिदात्री अपने भक्तों को यह सभी सिद्धियां देने में समर्थ है. 
देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने माँ सिद्धिदात्री की ही आराधना की थी. जिनकी अनुकंपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था और वह जगत में अर्धनारीश्वर के नाम से प्रख्यात हुए थे. 
माता के इस स्वरूप में चार हस्त है जिसमें दाहिने दो हाथों में  चक्र और गदा तथा बाये दोनों हाथों में पुष्प और शंख  सुशोभित है. देवी सिद्धिदात्री अपने भक्तों को कमल के पुष्प पर आसन्न होकर  दर्शन देती हैं परंतु इनका सवारी सिंह भी है. जो कोई भी जातक नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूरी निष्ठा के साथ आराधना करता है. माता उसकी सभी मनोकामना को पूरा कर उन्हें समस्त सिद्धियां प्रदान करती है.
इस लेख के माध्यम से हमने माँ दुर्गा के नौवें स्वरुप माँ सिद्धिदात्री की कथा को विधिपूर्वक बताने का प्रयास किया है. यह रूप माँ का अंतिम स्वरुप है जो कि परम सिद्धियों को देने वाला हैं.  धर्म और आध्यात्म से जुड़ी ऐसे ही  तमाम लेखो को पढ़ने के लिए हमसे जुड़े रहे.


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(Updated Date & Time :- 2020-04-02 11:08:37 )


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