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शिव पुराण के अनुसार बाबा विश्वनाथ (श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग) का रहस्य

शिव पुराण के अनुसार बाबा विश्वनाथ (श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग) का रहस्य

धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से सृष्टि के आरंभ मे ब्रह्मा, विष्णु और महेश का योगदान सर्वाधिक रहा है। समस्त सिद्धियो को देने वाले महादेव कि आराधना सिर्फ मनुष्य और देवता ही नही अपितु वानर, दैत्य, गंदर्भ,असुर, तथा किन्नर भी करते है। शिव पुराण कि कोटीरूद्र संहिता के अंतर्गत महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों के महत्व को बताया गया है। जो कि भारत के अलग-अलग राज्यो मे स्थित है।

इस लेख मे हम जानेंगे कि आखिर क्या है इन ज्योतिर्लिंगों के स्थापना कि कथा साथ ही क्यों है इसकी इतनी महत्ता। इस लेख के माध्यम से हम उत्तर प्रदेश के काशी में स्थित बाबा विश्वनाथ मंदिर (विश्ववेश्वर ज्योतिर्लिंग) कि कथा को विधिपूर्वक बताने का प्रयास करेंगे।

पवित्र गंगा की धाराओं से सुशोभित बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में ही महादेव का सातवां ज्योतिर्लिंग स्थापित है। कहते है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना स्वयं परम ब्रह्म भगवान शिव ने की थी।  उत्तर प्रदेश में स्थित काशी नगरी को आध्यात्म की दृष्टि से बहुत महत्त्व दिया गया है। काशी के संदर्भ में जो श्लोक पुराणों में लिखे गए है वह इस प्रकार से है कि...

मरणं मंगलं यत्र विभूतिश्च विभूषणम्।

कौपीनं यत्र कौशेयं सा काशी केन मीयते।।

अर्थात जहाँ मारना भी मंगलकारी, भस्म का त्रिपुंड (तिलक) ही अलंकार, लंगोटी ही जहाँ रेशमी वस्त्रों के समान हो ऐसीे काशी का सेवन भला कौन नही करना चाहेगा।

बाबा विश्वनाथ मंदिर की पौराणिक कथा -

बाबा विश्वनाथ मंदिर कि स्थापना के संदर्भ में जो कथा शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता के अंतर्गत मिलती है उसका प्रसंग इस प्रकार से है।

किसी समय की बात है जब परम ब्रह्म भगवान् शिव ने  निराकार निर्गुण रूप से सगुण रूप धारण किया और स्वयं को दो भागों में विभाजित किया। जिसमे एक तत्व पुरुष अर्थात शिव और एक तत्व स्त्री अर्थात शक्ति कहलाई।

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उन शिव और शक्ति ने निराकार रह कर ही प्रकृति और पुरुष तत्व  की रचना की जो वास्विकता में विष्णु (श्रीहरि) और उनकी पत्नी ही थी। परंतु जब दोनों ने स्वयं को अकेला पाया तो अपने माता पिता के वियोग में  व्याकुल हो उठे तभी आकाशवाणी हुई की आप दोनों को तपस्या करनी चाहिए जिससे की आप दोनों से प्रकृति का सृजन हो सके । आकाश की गर्जना सुन कर पुरुष  और प्रकृति एक ऐसे स्थान की खोज में निकल पड़े जहाँ दोनों बैठ कर तपस्या कर सके। उन दोनों की तपस्या के लिए निराकार ब्रह्म में स्वयं 5 कोष लंबे पंचक्रोशी सुन्दर नगर का निर्माण किया और उसे आकाश में शुशोभित किया। यहीं पर भगवान् श्री हरि ने पृथ्वी के सृजन हेतु महादेव का ध्यान कर घोर  तपस्या की। इस  तपस्या  और कठिन परिश्रम से श्री हरि के शरीर से श्वेत धाराए प्रकट हुई और इस जल की बूंदों से पूरा आकाश व्याप्त हो गया । यह अद्भुत दृश्य देख श्री हरी अचरज में आ गए और उन्होंने अपने सर को हिलाया तभी उनके कानों से एक मणि वहीँ जा गिरी। जिस जगह पर यह मणि गिरी वह स्थान मानिकनिका कहलायी। और जब ये इस श्वेत जल से पंचक्रोशी नदी डूबने लगी तो स्वयं ब्रह्म शिव ने उसे अपनी त्रिशूल में धारण कर लिया। जिससे की इसी जगह पर श्री हरि अपनी पत्नी के साथ विराजमान हो गए। यहीं पर श्री हरि की नाभि से सृजनकर्ता ब्रह्मा जी का जन्म हुआ जिन्होंने अपने तेज़ से इस पूरी सृष्टि का सृजन करना आरंभ किया।

फिर शिव ने सोचा की सृष्टि के सृजन के बाद अपने कार्यो में अविमुक्त मनुष्य मुझे कहाँ ढूंढने आएगा? इसलिए शिव ने उस पंचक्रोशी नगर को वहिं छोड़ दिया। बता दें कि इस जगह पर स्वयं महादेव नेे खुद को लिंग रूप में स्थापित किया है और ऐसा भी माना जाता है कि यदि पूरी सृष्टि में  प्रलय भी आ जाये तो काशी का अंत कभी नही होगा क्योंकि प्रलयकाल में स्वयं महादेव काशी नगरी को आने त्रिशूल में धारण कर लेते है।

इस लेख मे हमने काशी में स्थित विश्वनाथ मंदिर (विश्ववेश्वर  ज्योतिर्लिंग) कि कथा का सार विधिपूर्वक बताया है। अन्य ज्योतिर्लिंगों के स्थापना संबन्धित कथाएँ आगे के लेख मे पढ़ने को मिलेगी।


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(Updated Date & Time :- 2020-03-19 14:44:50 )


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