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हरियाली तीज का व्रत क्यों है भारतीय महिलाओं के लिये खास?

हरियाली तीज का व्रत क्यों है भारतीय महिलाओं के लिये खास?

भारतीय पंचांग के अनुसार हर वर्ष हरियाली तीज का व्रत सावन महीने की तृतीया तिथि को बडी श्रद्धा और उत्सव के साथ भारतीय महिलायें मनाती है । इस तीज को श्रावनी तीज के नाम से भी जाना जाता है जो इस वर्ष 3 अगस्त दिन शनिवार को पड रही है। मुख्य रुप से यह त्यौहार उत्तरी भारत, दक्षिणी भारत में विशेषतौर पर मनाया जाता है।

हरियाली तीज के व्रत से महिलाएं कैसे पाती हैमाता पार्वती की कृपा और क्या है इसकी पूजा विधि ?

महिलाओं के इस त्योहार में जब प्रकृति हरियाली की चादर ओढ़ी होती है तो सभी के मन में मोर नाचने लगते हैं। जहां एक ओर पेड़ों की डालों में झूले डाले जाते हैं तो वहीं दूसरी ओर यह व्रत सुहागन स्त्रियों के लिए बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। आस्था, सौंदर्य और प्रेम से भरा यह उत्सव भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चारों ओर हरियाली होने की वजह से इसे हरियाली तीज भी कहा जाता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए भगवान शिव और पार्वती की पूजा करती है। इस दिन महिलाएं साज श्रृंगार और मेंहदी लगाकर लोक गीतों का मजा उठाती हैं और झूला झूलती हैं। तीज के दिन महिलाएं भगवान शिव और पार्वती की पूजा करती हैं और अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। तीज के व्रत को शास्त्रों में करवा चौथ के समान ही महत्व दिया गया है।

पूजन करने की विधि – इस व्रत को प्रारंभ करने से पहले नित्य नियम से निवृत्य होकर अपने मन में इस व्रत की पूजा का संकल्प लें । पूजा करने के पूर्व भगवान महादेव, गणेश जी और माता पार्वती की प्रतिमा काली मिट्टी से निर्मित करें तत्पश्चात थाली में सुहाग की सामग्रियों को एकत्रित कर व सजाकर माता पार्वती को चढ़ाना चाहिए। जिसके बाद भगवान शिव को वस्त्र चढ़ाकर तीज व्रत की कथा सुननी या पढ़नी चाहिए। पूजा संपन्न होने के बाद भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की आरती अवश्य करें ।

हरियाली तीज की व्रत कथा – शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव एक दिन माता पार्वती को अपने विवाह की कथा सुनाते हैं। भगवान शिव माता पार्वती को स्मरण कराते हैं कि तुमने मुझे अपने पति के रूप में पाने के लिए 107 बार जन्म लिया, लेकिन तुम मुझे अपने पति के रूप में एक भी बार नही पा सकी। फिर जब 108वीं बार तुमने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लिया तो तुमने मुझे अपने वर के रूप में पाने के लिए हिमालय पर घोर तपस्या की। और उस तपस्या के दौरान तुमने अन्न-जल का भी त्याग कर दिया था। और सूखे पत्तों चबाकर तुम पूरा दिन बिताती थी। बिना मौसम की परवाह किए हुए तुमने निरंतर तप किया। तुम्हारे पिता तुम्हारी ऐसी स्थिति देखकर बहुत दुखी व नाराज थे। लेकिन फिर भी तुम वन में एक गुफा के अंदर मेरी आराधना में लीन रहती थी। भाद्रपद के महीने में तृतीय शुक्ल को तुमने रेत से एक शिवलिंग बनाकर मेरी आराधना की जिससे खुश होकर मैने तुम्हारी मनोकामना पूरी की। जिसके बाद तुमने अपने पिता से कहा कि 'पिताजी, मैंने अपने जीवन का काफी लंबा समय भगवान शिव की तपस्या में बिता दिया है। और अब भगवान शिव ने मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर मुझे स्वीकार भी लिया है। इसलिए अब मैं आपके साथ तभी चलूंगी जब आप मेरा विवाह भगवान शिव के साथ ही करेंगे। जिसके बाद पर्वतराज ने तुम्हारी इच्छा स्वीकार कर लिया और तुम्हें घर वापस ले गए। कुछ समय बाद ही उन्होंने पूरे विधि विधान के साथ हमारा विवाह करा दिया। शिव जी कहते हैं कि हे पार्वती! भाद्रपद शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था यह उसी का परिणाम है जो हम दोनों का विवाह संभव हो सका। शिव जी ने पार्वती जी से कहा कि इस व्रत का महत्त्व यह है कि इस व्रत को पूरी निष्ठा से करने वाली प्रत्येक स्त्री को मैं मनवांछित फल देता हूँ। इतना ही नही भगवान शिव ने पार्वती जी से कहा कि जो भी स्त्री इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करेंगी उसे तुम्हारी तरह अचल सुहाग की प्राप्ति होगी।


Date & Time :- 21 Aug 2019 22:29:59

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