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महाभारत के युद्ध में कौरवों के युयुत्सु ने क्यों दिया था पांडवों का साथ

महाभारत के युद्ध में कौरवों के युयुत्सु ने क्यों दिया था पांडवों का साथ

इन दिनों महाभारत और रामायण की खासी चर्चा रही है। क्योंकि सरकार ने दूरदर्शन पर पुनः इसका प्रसारण शुरू कर दिया है। 90 के दशक में जब इसका प्रसारण आरम्भ हुआ था तो इसे देखने की उत्सुकता में सड़कें खाली हो जाया करती थी. लोग अपने घरों को साफ़ सुथरा कर स्नान कर इसे देखने बैठ जाते थे। वैसे सड़के तो आज भी  खाली है परंतु स्थितियां अलग है। खैर ये एक अलग विषय है.
रामायण की तो आज - कल ज्यादा ही  चर्चा रही है परंतु आज हम बात करेंगे महाभारत की. महाभारत हमें ज्ञान, कूटनीति, राजनीति, धर्म, की शिक्षा देता है श्री कृष्ण द्वारा दिया गया अर्जुन को गीता का उपदेश ही समस्त जीवन का सार अपने अंदर समाहित किए हुए हैं. 
महाभारत में अनेको ऐसे पात्र है जो हमें कुछ ना कुछ शिक्षा अवश्य देते हैं तो आज हम बात करेंगे महाभारत के ऐसे ही एक चरित्र की जिसने अधर्मी पक्ष में होते हुए भी धर्म का साथ देना ज्यादा उचित समझा.
हम बात कर रहे है युयुत्सु की तो आइये जानते है कौन थे युयुत्सु ?
 युयुत्सु कौन थे ?
गांधारी के गर्भवती होने के बाद हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र की सेवा और कई सारे काम के लिए वणिक समाज की एक दासी रखी गई। धृतराष्ट्र ने दासी के साथ संबंध बना लिया। जिसके बाद दासी भी गर्भवती हो गई और उसने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम युयुत्सु रखा गया। हालांकि दासी का पुत्र होने के बावजूद युयुत्सु का पालन-पोषण राजकुमार की तरह किया गया। उन्हें राजकुमार की तरह सम्मान, शिक्षा और अधिकार मिला, क्योंकि वे धृतराष्ट्र के पुत्र थे।
कौरवों के पक्ष में कभी नहीं रहे युयुत्सु 
युयुत्सु कौरवों की ओर से लड़ने के लिए कुरुक्षेत्र पहुंचे थे। युयुत्सु कौरवों के भाई ज़रूर थे लेकिन वे हर वक्त कौरवों की अनैतिक हरकतों का विरोध करते थे। उन्होंने महाभारत के युद्ध में भी कौरवों का विरोध कर पांडवों का साथ दिया था।
युयुत्सु का पालन-पोषण ज़रूर कौरवों के साथ हुआ था लेकिन वो सभी भाइयों से काफी अलग था। यही वजह थी कि दुर्योधन और उसके अन्य भाई युयुत्सु को पसंद नहीं करते थे और हमेशा उसका मज़ाक बनाते थे। वह दुर्योधन की अनैतिक इच्छाओं को पसंद नहीं करता था और काफी हद तक इसका विरोध भी करता था। इस बात को युधिष्ठिर अच्छी तरह जानते थे.
महाभारत के युद्ध के समय विशेष भूमिका में रहे युयुत्सु 
युयुत्सु के व्यक्तित्व में संत धर्मात्मा के गुण समाहित थे । उसने महाभारत के युद्ध को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो ऐसा करने में असमर्थ रहें । शुरुआत में युयुत्सु कौरवों के साथ थें लेकिन युधिष्ठिर की घोषणा के बाद वो पांडवों की सेना की ओर चले गए । दरअसल, किस्सा कुछ ऐसा था कि युद्ध की शुरुआत से पहले युधिष्ठिर ने कौरव सेना को सुनाते हुए एक घोषणा की – “मेरा पक्ष धर्म का है और जो भी धर्म के लिए लड़ना चाहते हैं, वो अभी मेरे पक्ष में आ सकते हैं।” इस घोषणा को सुनकर युयुत्सु कौरवों की सेना छोड़कर पांडवों की सेना में शामिल हो गया। युधिष्ठिर ने भी उसको गले लगाकर स्वागत किया।
युधिष्ठिर ने अपनी रणनीति के तहत युयुत्सु को युद्ध के मैदान में नहीं भेजा बल्कि एक विशेष काम सौंपा,जिस काम में वो पूरी तरह से निपुण था। युधिष्ठिर ने युयुत्सु की योग्यता को देखते हुए उसे योद्धाओं के लिए हथियारों की आपूर्ति की व्यवस्था करने का काम सौंपा। पांडवों की सेना 9 लाख के आसपास थी और हथियारों की संख्या कम। इसके बावजूद युयुत्सु ने अपनी ज़िम्मेदारी को अच्छे से निभाया और पांडव सेना को हथियारों की कमी नहीं होने दी।
कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध में बच गए 18 योद्धाओं में से युयुत्सु भी एक थे। युद्ध के बाद महाराजा युधिष्ठिर ने युयुत्सु को अपना मंत्री बना लिया। पिता धृतराष्ट्र की मृत्यु के बाद युयुत्सु ने उन्हें मुखाग्नि देकर पुत्र धर्म निभाया।
तो ये थी धर्मात्मा युयुत्सु की पूरी कथा ऐसे ही अनेको रहस्यमयी चरित्रों की व्याख्या हम अपने आगे के लेखो में करते रहेंगे.  धर्म  और ज्योतिष से सम्बंधित जानकारियों को पाने के लिए हमसे जुड़े रहें


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(Updated Date & Time :- 2020-04-09 18:04:42 )


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