एकदंत संकष्टी चतुर्थी 2026: अंगारकी चतुर्थी का महासंयोग, पौराणिक कथाएँ और व्रत विधि

एकदंत संकष्टी चतुर्थी 2026: अंगारकी चतुर्थी का महासंयोग, पौराणिक कथाएँ और व्रत विधि

हिंदू धर्म की मान्यताओं में भगवान श्री गणेश का स्थान सर्वोपरि है। वे न केवल 'प्रथम पूज्य' हैं, बल्कि 'विघ्नहर्ता' भी हैं, जो अपने भक्तों के मार्ग में आने वाली हर बाधा को हर लेते हैं। वर्ष 2026 में 5 मई, मंगलवार के दिन पड़ने वाली एकदंत संकष्टी चतुर्थी भक्ति और ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

जब भी संकष्टी चतुर्थी मंगलवार के दिन आती है, तो उसे 'अंगारकी चतुर्थी' के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों में अंगारकी चतुर्थी का महत्व सामान्य चतुर्थी से सौ गुना अधिक बताया गया है। आइए, इस पावन दिन के महत्व, इससे जुड़ी रोचक कथाओं और पूजन विधि को विस्तार से समझते हैं।

तिथि और शुभ मुहूर्त

वर्ष 2026 में ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 5 मई को पड़ रही है। मंगलवार का दिन होने के कारण यह 'अंगारकी योग' बना रही है।

विशेष विवरण

समय / जानकारी

व्रत की तिथि

5 मई 2026, मंगलवार

चतुर्थी नाम

एकदंत संकष्टी चतुर्थी

योग

अंगारकी संकष्टी चतुर्थी

मुख्य देवता

भगवान गणेश (एकदंत स्वरूप)

चंद्रोदय समय

रात्रि 09:20 से 09:55 के मध्य (स्थान अनुसार परिवर्तन संभव)

अंगारकी चतुर्थी' का विशेष महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मंगल देव (जिन्हें अंगारक भी कहा जाता है) ने भगवान गणेश की कड़ी तपस्या की थी। गणेश जी ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि जब भी मंगलवार के दिन चतुर्थी तिथि आएगी, वह 'अंगारकी चतुर्थी' कहलाएगी।

  • ऋण मुक्ति: यह दिन उन लोगों के लिए रामबाण है जो भारी कर्ज में डूबे हैं।
  • मंगल दोष का निवारण: जिनकी कुंडली में मंगल भारी है या मांगलिक दोष के कारण विवाह में अड़चनें आ रही हैं, उनके लिए यह व्रत सर्वोत्तम है।
  • पुण्य की प्राप्ति: कहा जाता है कि अंगारकी चतुर्थी का व्रत करने से पूरे वर्ष की संकष्टी चतुर्थी का फल मिल जाता है।

एकदंत संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक कथाएँ

इस दिन को 'एकदंत' क्यों कहा जाता है और इसके पीछे की कहानी क्या है? आइए जानते हैं दो सबसे प्रचलित कथाएँ:

कथा 1: परशुराम जी और गणेश जी का युद्ध

एक बार भगवान विष्णु के अवतार परशुराम जी अपने गुरु भगवान शिव से मिलने कैलाश पहुंचे। उस समय महादेव विश्राम कर रहे थे और गणेश जी द्वार पर पहरा दे रहे थे। जब परशुराम जी ने भीतर जाने का प्रयास किया, तो गणेश जी ने उन्हें रोक दिया।

परशुराम जी क्रोधित हो गए और दोनों के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया। अंत में परशुराम जी ने अपने अमोघ अस्त्र 'परशु' (फरसे) से वार किया। गणेश जी जानते थे कि यह अस्त्र उनके पिता शिव का है, इसलिए उन्होंने उसका सम्मान करने के लिए उस वार को अपने एक दांत पर झेल लिया। इससे उनका एक दांत टूट गया और वे हमेशा के लिए 'एकदंत' कहलाए।

कथा 2: गजमुखासुर का संहार

एक अन्य कथा के अनुसार, गजमुखासुर नाम के राक्षस को वरदान था कि उसे कोई भी जीवित प्राणी या शस्त्र नहीं मार पाएगा। उसने स्वर्ग और पृथ्वी पर आतंक मचा दिया। तब गणेश जी ने उसे युद्ध के लिए ललकारा। जब सारे शस्त्र निष्फल हो गए, तब गणेश जी ने अपना दायां दांत स्वयं तोड़कर मंत्रोच्चार के साथ उस पर प्रहार किया। उस दिव्य दांत के वार से राक्षस का अहंकार टूट गया और वह मूषक (चूहा) बनकर भगवान की शरण में आ गया।

सीख: यह कथा हमें सिखाती है कि महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यदि हमें अपनी प्रिय वस्तु (जैसे दांत) का त्याग करना पड़े, तो भी पीछे नहीं हटना चाहिए।

विस्तृत पूजन विधि

5 मई 2026 को अंगारकी चतुर्थी के दिन सुबह से ही भक्ति का वातावरण बनाए रखें।

प्रातः काल की पूजा:

  • ब्रह्म मुहूर्त में उठें: सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें। संभव हो तो पानी में थोड़े काले तिल डालकर स्नान करें।
  • लाल वस्त्र: इस दिन लाल रंग के वस्त्र पहनना शुभ होता है क्योंकि यह मंगल देव और गणेश जी दोनों को प्रिय है।
  • संकल्प: भगवान के सामने हाथ जोड़कर कहें— "हे मंगलमूर्ति, मैं अपने संकटों के नाश और आपकी प्रसन्नता के लिए आज एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने का संकल्प लेता/लेती हूँ।"

दोपहर का समय:

  • दोपहर में भगवान गणेश के 'एकदंत' स्वरूप का मानसिक ध्यान करें।
  • पवित्र स्तोत्रों जैसे 'गणेश अथर्वशीर्ष' या 'संकटनाशन गणेश स्तोत्र' का पाठ करें।

संध्या काल (मुख्य पूजा):

  • वेदी निर्माण: एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें।
  • पंचामृत स्नान: प्रतिमा को जल, दूध, दही, शहद और घी (पंचामृत) से स्नान कराएं।
  • श्रृंगार: गणेश जी को लाल सिंदूर का तिलक लगाएं। उन्हें दूर्वा (21 गांठें), लाल फूल और शमी के पत्ते अर्पित करें।
  • भोग: एकदंत को मोदक या बेसन के लड्डू चढ़ाएं। चूंकि यह अंगारकी चतुर्थी है, इसलिए गुड़ और तिल का भोग विशेष फलदायी होता है।
  • अर्घ्य और आरती: धूप-दीप जलाकर गणेश जी की आरती करें।

चंद्र दर्शन और अर्घ्य का महत्व

  • संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा को जल दिए बिना पूरा नहीं होता। 5 मई की रात जब चंद्रमा उदय हो, तब:
  • एक तांबे के लोटे में जल लें।
  • उसमें थोड़ा दूध, चंदन और सफेद फूल डालें।
  • चंद्रमा की ओर मुख करके धीरे-धीरे जल अर्पित करें और अपनी मनोकामना दोहराएं।
  • इसके बाद ही अपना व्रत खोलें (पारण करें)।

इस दिन क्या खाएं और क्या न खाएं?

  • तामसिक भोजन से बचें: लहसुन, प्याज, मांस और मदिरा का पूरी तरह त्याग करें।
  • फलाहार: व्रत के दौरान आप दूध, फल, साबूदाना खिचड़ी या कुट्टू के आटे का सेवन कर सकते हैं।
  • नमक का प्रयोग: यदि आवश्यक हो, तो केवल सेंधा नमक का ही प्रयोग करें।
  • ब्रह्मचर्य: इस पावन दिन पर मन और शरीर की शुद्धता बनाए रखें।

अंगारकी चतुर्थी के विशेष उपाय

  • विद्यार्थियों के लिए: यदि पढ़ाई में मन नहीं लगता, तो इस दिन गणेश जी को 21 दूर्वा चढ़ाकर 'ॐ मेधायै नमः' का जाप करें।
  • व्यापार में उन्नति: कार्यक्षेत्र में बाधा आ रही हो, तो भगवान को लाल रंग के पुष्प चढ़ाएं।
  • कर्ज मुक्ति के लिए: इस दिन 'ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र' का पाठ करना चाहिए।

निष्कर्ष

एकदंत संकष्टी चतुर्थी (अंगारकी योग) स्वयं को आध्यात्मिक रूप से जाग्रत करने और जीवन की परेशानियों से मुक्ति पाने का एक सुनहरा अवसर है। 5 मई 2026 का दिन आपके और आपके परिवार के लिए मंगलकारी हो। सच्चे मन से किया गया छोटा सा प्रयास भी बप्पा को प्रसन्न करने के लिए पर्याप्त है।

।। गणपति बप्पा मोरया ।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. क्या अंगारकी चतुर्थी का व्रत निर्जला रखना अनिवार्य है?

नहीं, यह आपकी श्रद्धा और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। आप फलाहारी व्रत (फल और दूध के साथ) रख सकते हैं। महत्वपूर्ण आपकी भक्ति और नियम पालन है।

2. 5 मई 2026 को चंद्रोदय का सटीक समय क्या है?

अंदाजन समय रात 09:20 से 09:55 के बीच है। हालांकि, दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में समय में 10-15 मिनट का अंतर हो सकता है। सटीक समय के लिए उस दिन का समाचार पत्र या पंचांग देखें।

3. क्या हम इस दिन तुलसी का प्रयोग कर सकते हैं?

बिल्कुल नहीं। पौराणिक कथा के अनुसार, गणेश जी ने तुलसी को अपनी पूजा से वर्जित किया था। उनकी पूजा में केवल दूर्वा का ही महत्व है। भूलकर भी गणेश जी को तुलसी न चढ़ाएं।

4. यदि चंद्र दर्शन न हो पाए तो क्या व्रत टूट जाएगा?

अगर बादलों के कारण चंद्रमा दिखाई न दे, तो परेशान न हों। पंचांग के अनुसार आपके शहर में जो चंद्रोदय का समय है, उस समय आकाश की ओर मुख करके चंद्रमा का मानसिक ध्यान करें, अर्घ्य दें और अपना व्रत पूरा करें।

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