ravidas jayanti 2025

गुरु रविदास जी की शिक्षाओं से सजेगा रविदास जयंती का पावन अवसर

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, गुरु रविदास जी (1377-1527 ई.) का जन्म माघ मास की पूर्णिमा तिथि को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था। इसीलिए प्रत्येक वर्ष उनकी जयंती माघ पूर्णिमा को मनाई जाती है, जो इस वर्ष 12 फरवरी 2025 को मनाई जाएगी। संत शिरोमणि रविदास, जिन्हें रैदास, रोहिदास और रूहीदास के नाम से भी जाना जाता है, उनकी माता का नाम कलसा देवी तथा पिता का नाम संतोख दास था। गुरु रविदास भक्ति आंदोलन के एक प्रसिद्ध संत थे। उनके भक्ति गीतों और भजनों ने भक्ति आंदोलन पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला है। गुरु रविदास और कबीर दास दोनों गुरुभाई थे, क्योंकि दोनों गुरु स्वामी रामानंद जी के शिष्य थे। Astroscience के इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि रविदास जयंती का महत्व और उत्सव की जानकारी क्या है।

 

गुरु रविदास जयंती क्यों मनाई जाती है?

 

रविदास जयंती क्यों मनाई जाती है, इसका भी एक खास महत्व है। अगर आप नहीं जानते हैं, तो हम आपको बताने जा रहे हैं। गुरु रविदास जी ने समाज में भेदभाव और जातिवाद के खिलाफ आवाज़ उठाई और सच्चे प्रेम, समानता और मानवता का संदेश दिया था। गुरु रविदास एक ऐसे संत के रूप में उभरे, जिनकी शिक्षाएं और लोक कल्याण से जुड़े कार्यों को आज भी याद किया जाता है।


गुरु रविदास जी के अनुयायी उनके सम्मान में आरती और पूजा करते हैं। वाराणसी में रविदास जी के जन्म स्थान पर बने श्री गुरु रविदास जन्म स्थान मंदिर में भव्य समारोह का आयोजन किया जाता है। इस दिन, गुरु रविदास जी के अनुयायी पवित्र नदी में डुबकी भी लगाते हैं। उनके अनुयायी सुबह के समय भजन-कीर्तन करते हुए प्रभात फेरी निकालते हैं और साथ ही गुरु रविदास जी के भजन भी गाते हैं। गुरु रविदास जी के मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। उनकी प्रतिमा का अभिषेक किया जाता है और उन्हें नए वस्त्र भी पहनाए जाते हैं। इस अवसर पर कई जगहों पर लंगर का आयोजन भी किया जाता है, जहां हर जाति के लोग साथ बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं और इसे ही जात-पात से ऊपर उठकर समानता का प्रतीक माना जाता है।

 

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गुरु रविदास जी का जीवन


उनके जन्म के समय, उन्होंने समाज में जात-पात, छुआछूत, कर्मकांड और धार्मिक कट्टरता और कुरीतियों को देखा। उन्होंने बचपन से ही जात-पात और ब्राह्मण समाज की विचारधारा का खंडन किया। अपने जीवन में, उन्होंने शूद्र लोगों पर हो रहे जुल्मों को अपने शरीर पर खुद सहा और अपने लेखन में इसके विरुद्ध बुलंद आवाज़ उठाई। उन्होंने अपनी जात और काम को छोटा जानकर छुपाया नहीं, बल्कि डंके की चोट पर बताया।


चर्मकार कुल से होने के कारण, जूते बनाने का अपना पैतृक व्यवसाय उन्होंने हृदय से अपनाया था। वे पूरी लगन तथा परिश्रम से अपना कार्य करते थे। गुरु रविदास ने जीवन यापन के लिए जूते बनाने और मरम्मत का काम सीखा। उन्होंने इस काम को सेवा के रूप में देखा, न कि नीच काम के रूप में।


संत रविदास जी को 7 वर्ष की उम्र में ही भक्ति का गाढ़ा रंग लग चुका था। वे हमेशा ही दीन-दुःखी और जरूरतमंदों की सहायता और भलाई करने के लिए तैयार रहते थे। उन्हें अपने घर में जो कुछ सामान दिखाई देता या घर का सारा धन, सब कुछ वे जरूरतमंदों को दे आते थे।


उन्हें साधु-संतों की संगत में बैठना बहुत पसंद था और वे हमेशा राम नाम का स्मरण किया करते थे। ऐसा देखकर, उनके पिता ने सोचा कि कहीं उनका बेटा घर छोड़कर न चला जाए और संन्यास न अपना ले। तो उन्होंने अपने बेटे को भक्ति की राह से मोड़ने के लिए अपने बाप-दादा के चमड़े के कारोबार में लगा दिया। बिना यह सोचे कि समाज इसे नीची नज़र से देखता है, इस काम को भी उन्होंने हृदय से अपनाया।


उस समय, समाज में छोटी जाति को भक्ति करने का हक़ ही नहीं दिया जाता था। इसलिए, उनके पिता चाहते थे कि वे अपना सारा ध्यान कारोबार में लगाएं और विवाह करके अपनी गृहस्थी की जिम्मेदारी संभालें। यह सोचकर, उन्होंने अपने पुत्र का विवाह श्रीमती लोना देवी जी के साथ कर दिया। बाद में, उनके घर एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम रखा विजय दास। उन्हें अलग रहकर अपनी गृहस्थी संभालने को कहा गया, और रविदास जी ने उनका यह हुक्म मान लिया। परंतु, विवाह होने के बाद भी, वे अपने काम के साथ-साथ प्रभु भक्ति में और ज्यादा लीन हो गए थे और उन्होंने अपने घर के सामने एक मंदिर भी बनाया था।


रविदास महाराज जी काम के साथ-साथ लोगों को प्रभु भक्ति का उपदेश भी दिया करते थे। धीरे-धीरे, उनके मंदिर में ऊंचे कुल के लोग भी आने लगे। इससे उनकी लोकप्रियता दूर-दूर तक फैल गई। यहाँ तक कि संत रविदास जी की महिमा सुनकर, चित्तौड़गढ़ के राणा सांगा की पटरानी झाली बाई रविदास जी से इतनी प्रभावित हुईं कि वो उनसे मिलने गईं और उनकी चेली बन गईं। रानी झाली बाई के अलावा, मीरा बाई ने भी संत रविदास से मिलने के बाद उन्हें अपना गुरु मान लिया था।

 

गुरु रविदास जी की शिक्षाएं


गुरु रविदास जी ने समाज को समानता, प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया था, जिससे समाज में हर तबके के लोग एक साथ मिल-जुलकर जी पाएं। उनकी प्रमुख शिक्षाएं कुछ इस प्रकार हैं:

 

1. सिद्धांत: गुरु रविदास जी का कहना था कि सब मनुष्य एक समान हैं। किसी भी जाति, धर्म और सामाजिक वर्गों के आधार पर उनमें भेदभाव करना बहुत ही गलत है।

 

2. ईश्वर के प्रति उनकी भक्ति: उनका कहना था कि ईश्वर हम सबके अंदर है। उन्हें मंदिरों या मूर्तियों में खोजने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि वो तो हमारे मन में ही मौजूद हैं।

 

3. कर्म का महत्व: गुरु रविदास जी का कहना था कि हमारे कर्म ही हमें ऊंचा या नीचा बनाते हैं। अच्छे कर्म करने से ही हमें हमारे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

 

4. भ्रष्टाचार का विरोध: गुरु रविदास जी ने समाज में फैले भ्रष्टाचार, जातिवाद, अंधविश्वास और सामाजिक असमानताओं का विरोध किया।

 

5. भक्ति आंदोलन: गुरु रविदास जी भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतों में से एक थे। उन्होंने भक्ति के माध्यम से समाज में बदलाव लाने का काम किया था।

 

गुरु रविदास जी के प्रसिद्ध मुहावरे


उनका एक प्रसिद्ध मुहावरा है: "मन चंगा तो कठौती में गंगा"। इसका अर्थ है कि अगर आपका मन शुद्ध है, नीयत अच्छी है, तो वो कार्य गंगा की तरह पवित्र है। रविदास जी ने यह बताया कि मन की शुद्धता ज्यादा महत्वपूर्ण है, न कि बाहरी कर्म। रविदास जी ने मन की शुद्धता पर ज़ोर दिया।


उन्होंने अपने पैतृक काम को करके सारी दुनिया को यह संदेश दिया कि "हथ कार वाल ते चित यार वाल"
। यानी, मनुष्य को अपने हाथों से काम करना चाहिए, पर दिल हमेशा अपने प्यारे प्रभु की तरफ ही होना चाहिए।


"ऊंचे मंदिर सुंदर नारी, राम नाम बिन बाजी हारी। मेरी जात कमीनी, पांत कमीनी, ओछा जन्म हमारा। तुम सरणागत राजा रामचंद्र, कह रविदास चमारा।"


इसका अर्थ है कि ऊंचे मंदिरों, भवनों और शीश महलों में रहने वाली, हे जवानी में मदमस्त सुंदर नारियों, राम नाम जपे बिना जीवन की बाजी तुम हार जाओगी। मेरी तो जात नीची है, इज्जत भी नीची है, जन्म भी चमारों के घर हुआ है। हे प्रभु, हम पर मेहर करो। हे राम, अब मैं तेरी शरण में आ गया हूं।

 

गुरु रविदास जी के द्वारा किए गए चमत्कार


रविदास जी को ब्राह्मणों और काशी के राजा द्वारा अपनी भक्ति साबित करने के लिए परखा गया। जब रविदास जी ने भजन गाया, तो शालिग्राम उनकी गोद में आकर बैठ गए, जिससे उनकी भक्ति की सत्यता सिद्ध हुई।

 

निष्कर्ष


गुरु रविदास जी का जीवन और शिक्षाएं हमें समानता, प्रेम और आध्यात्मिकता का संदेश देती हैं। उन्होंने समाज में होने वाले भेदभाव और छुआछूत का विरोध किया और एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना की, जहां सभी लोग समान हों और एक दूसरे का आदर करें। उनकी वाणी आज भी हमें प्रेरित करती है कि हम अपने कर्मों से खुद को और समाज को बेहतर बनाएं।


आज के समय में भी, उनकी शिक्षाएं उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी तब थीं। उनके विचार हमें यह सिखाते हैं कि जाति, धर्म और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता की सेवा करें और सच्चे प्रेम व समर्पण से ईश्वर की भक्ति करें। आइए, गुरु रविदास जी के आदर्शों को अपनाकर एक ऐसे समाज के निर्माण में योगदान दें, जहां प्रेम, भाईचारा और समानता की रोशनी हर ओर फैली हो।

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