ऐसा माना जाता है कि जब धरती पर असुरों का अत्याचार बढ़ गया था तब मां दुर्गा ने उनका संहार कर मानव जाति के जीवन की रक्षा की। कहा जाता है कि देवी दुर्गा और दैत्यों के संघर्ष के दौरान पृथ्वीलोक पर भयंकर अकाल पैदा हो गया था, चारों तरफ सूखा ही सूखा था। मां अंबे के द्वारा दैत्यों के संहार के बाद जब धरती फिर से हरी-भरी हुई, तब सबसे पहले जौ उगे, इसलिए जौ को समृद्धि और उर्वरता का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि में देवी की स्थापना के साथ जौ बोना सृष्टि के आरंभ और नए जीवन का प्रतीक माना जाता है। पूजा-पाठ में भी जौ का इस्तेमाल इसी कारण होता है।
उत्तर भारत में नवरात्रि के समय जौ बोने की परंपरा कई घरों में देखने को मिलती है। इसे खास तौर पर कलश स्थापना के साथ जोड़ा जाता है। नवरात्रि के पहले दिन पूजा स्थान पर मिट्टी से भरे पात्र में जौ बोए जाते हैं और अगले नौ दिनों तक उनकी देखभाल की जाती है।
जौ को समृद्धि, उन्नति और अच्छी फसल का प्रतीक माना जाता है। जिस तरह जौ का छोटा सा बीज कुछ दिनों में हरे पौधे का रूप ले लेता है, उसी तरह इसे जीवन में नई शुरुआत और आगे बढ़ने का प्रतीक भी माना जाता है।
जौ बोने का सही समय
नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के समय जौ बोने की परंपरा है। सबसे पहले पूजा स्थान को साफ करके वहां मिट्टी का एक साफ पात्र रखा जाता है। इसमें मिट्टी भरकर जौ के बीज बोए जाते हैं। कई परिवारों में जौ को कलश के पास रखा जाता है, जबकि कुछ जगहों पर इसे कलश स्थापना के पात्र के आसपास बोने की परंपरा होती है। इसमें परिवार और क्षेत्र के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है।
नवरात्रि में जौ बोने की विधि
जौ बोने की विधि बहुत आसान है। इसके लिए सबसे पहले एक साफ और चौड़ा मिट्टी का पात्र लें। उसमें साफ मिट्टी भरें। अब मिट्टी में जौ के बीज समान रूप से बिखेर दें और उनके ऊपर हल्की मिट्टी डाल दें। इसके बाद पात्र को पूजा स्थान पर रखें। कलश स्थापना और माँ दुर्गा की पूजा के बाद जौ को थोड़ा पानी दें। पूजा के दौरान माँ दुर्गा का ध्यान करते हुए परिवार की सुख-समृद्धि और शांति की प्रार्थना की जाती है।
जौ की देखभाल कैसे करें?
नवरात्रि के नौ दिनों तक जौ की नियमित देखभाल की जाती है। प्रतिदिन जरूरत के अनुसार थोड़ा पानी दें। ध्यान रखें कि मिट्टी बहुत ज्यादा गीली न हो। जौ को ऐसी जगह रखना चाहिए जहां उसे थोड़ी रोशनी मिल सके। बहुत तेज धूप में रखने से पौधे सूख सकते हैं। कुछ ही दिनों में जौ से हरे अंकुर निकलने लगते हैं और धीरे-धीरे ये पौधे लंबे होने लगते हैं।
नवरात्रि के अंत में जौ का क्या करें?
नवरात्रि की नवमी या दशमी के दिन जौ को पूजा के बाद श्रद्धा से काटा या निकाला जाता है। उत्तर भारत के कई परिवारों में इन ज्वारों को देवी का प्रसाद और आशीर्वाद मानकर घर के सदस्यों को दिया जाता है। कुछ जगहों पर ज्वारे मंदिर में चढ़ाए जाते हैं या किसी पवित्र स्थान पर रखे जाते हैं।
जौ से जुड़ी मान्यताएं
नवरात्रि में उगे जौ को लेकर कई लोक मान्यताएं भी प्रचलित हैं।
- हरा-भरा और तेजी से बढ़ना: यदि ज्वारे 2 से 3 दिन में ही उगकर घने और हरे-भरे हो जाएं, तो यह बहुत शुभ संकेत है. इसका अर्थ है कि घर में सुख-समृद्धि आएगी और माता की कृपा बनी रहेगी।
- सफेद और हरे रंग के ज्वारे: ज्वारों का ऊपर से हरा और नीचे से सफेद उगना बेहद शुभ माना जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि पूजा सफल हुई है और आने वाला समय उत्तम रहेगा।
- आधा पीला और आधा हरा: यदि ज्वारे नीचे से पीले और ऊपर से हरे हैं, तो यह संकेत है कि वर्ष का आधा समय अच्छा बीतेगा और आधे समय में कुछ संघर्ष या कठिनाइयाँ आ सकती हैं।
- जौ का देर से उगना या पीला पड़ना:
यदि ज्वारे बहुत धीमी गति से उगते हैं, पीले पड़ जाते हैं या ठीक से अंकुरित नहीं होते, तो इसे भविष्य में अधिक मेहनत के बाद सफलता मिलने या किसी कष्ट का संकेत माना जाता है।
हालांकि, जौ का कम या ज्यादा बढ़ना वैज्ञानिक रूप से भविष्य में होने वाली घटनाओं की भविष्यवाणी नहीं करता। यह मुख्य रूप से धार्मिक आस्था और पारंपरिक मान्यता से जुड़ा विषय है।
निष्कर्ष
नवरात्रि में जौ बोने की परंपरा उत्तर भारत की पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है। कलश स्थापना के साथ जौ बोना और नौ दिनों तक उनकी देखभाल करना नई शुरुआत, उन्नति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के अंत में उगे हुए ज्वारों को देवी का आशीर्वाद मानकर परिवार के सदस्यों को देना इस परंपरा को और खास बनाता है।
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