भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए पार्श्व एकादशी का व्रत बेहद पावन माना गया है। आमतौर पर लोग इसे परिवर्तिनी, पद्मा या फिर जलझूलनी एकादशी के नाम से भी पुकारते हैं। हिंदू पंचांग के हिसाब से यह एकादशी भादो (भाद्रपद) महीने के शुक्ल पक्ष में पड़ती है।
इसके पीछे एक बड़ी गहरी धार्मिक मान्यता जुड़ी है। दरअसल, चातुर्मास के समय श्री हरि विष्णु योगनिद्रा में होते हैं और ऐसा माना जाता है कि ठीक इसी दिन वह सोते हुए अपनी करवट बदलते हैं। भगवान के इसी करवट बदलने की वजह से इसे 'परिवर्तिनी एकादशी' कहा जाने लगा।
अगर साल 2026 की बात करें, तो इस बार यह एकादशी 22 सितंबर (मंगलवार) को मनाई जाएगी। इस खास दिन पर विष्णु जी के साथ-साथ मां लक्ष्मी और भगवान वामन की पूजा करने का बड़ा महत्व है। जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से उपवास रखकर प्रभु का ध्यान करते हैं, उनके जीवन में हमेशा सकारात्मक और शुभ बदलाव आते हैं।
पार्श्व एकादशी 2026 की तिथि
पार्श्व एकादशी 2026 में 22 सितंबर, मंगलवार को पड़ेगी। इस व्रत का पारण अगले दिन यानी बुधवार, 23 सितंबर 2026 को किया जाएगा। एकादशी व्रत में पारण का बहुत महत्व माना जाता है, इसलिए व्रत खोलने से पहले स्थानीय पंचांग के अनुसार सही समय देखना उचित रहता है।
यह एकादशी चातुर्मास के बीच आती है। चातुर्मास का समय भगवान विष्णु की आराधना, संयम, साधना और अच्छे कर्मों के लिए विशेष माना जाता है। पार्श्व एकादशी पर भक्त भगवान विष्णु से मन की शांति, परिवार की सुख-समृद्धि और जीवन में सही दिशा की प्रार्थना करते हैं।
पार्श्व एकादशी का महत्व
पार्श्व एकादशी का महत्व केवल व्रत रखने तक सीमित नहीं है। यह दिन जीवन में अच्छे बदलाव लाने की प्रेरणा देता है। “परिवर्तिनी” शब्द का अर्थ है परिवर्तन। इसलिए यह एकादशी हमें याद दिलाती है कि यदि व्यक्ति अपनी सोच, व्यवहार और कर्मों को बेहतर बनाना चाहे, तो जीवन में सकारात्मक बदलाव संभव है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को श्रद्धा से करने पर भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति के जीवन में शुभता बढ़ती है। यह व्रत मन को संयमित करने, नकारात्मक विचारों को कम करने और आत्मचिंतन करने का अवसर भी देता है।
कई बार जीवन में रुकावटें, चिंता या अस्थिरता महसूस होती है। ऐसे समय में भगवान विष्णु की उपासना व्यक्ति को धैर्य और संतुलन देती है। पार्श्व एकादशी का संदेश भी यही है कि कठिन समय में भी विश्वास, संयम और सही कर्म नहीं छोड़ने चाहिए।
भगवान वामन की पूजा का महत्व
पार्श्व एकादशी पर भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा का विशेष महत्व है। भगवान वामन विष्णु जी के पांचवें अवतार माने जाते हैं। इस अवतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी और धर्म की स्थापना की।
राजा बलि बहुत दानी और शक्तिशाली राजा थे। भगवान वामन ने छोटे ब्राह्मण बालक का रूप लेकर उनसे दान मांगा। जब राजा बलि ने तीन पग भूमि देने का वचन दिया, तब भगवान वामन ने विराट रूप धारण किया। एक पग में पृथ्वी, दूसरे में स्वर्ग नाप लिया और तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपना सिर अर्पित कर दिया।
इस कथा में दान, वचन, विनम्रता और अहंकार से जुड़ी गहरी सीख है। भगवान वामन का रूप हमें बताता है कि ईश्वर छोटे से रूप में भी बड़ी लीला कर सकते हैं।
पार्श्व एकादशी व्रत कथा
पार्श्व एकादशी की कथा राजा बलि और भगवान वामन से जुड़ी मानी जाती है। राजा बलि अपने दान और पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थे। उनके प्रभाव से देवताओं को चिंता होने लगी। तब भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण किया और राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे।
भगवान वामन ने राजा बलि से केवल तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि ने बिना सोचे यह दान देने का संकल्प कर लिया। इसके बाद भगवान वामन ने अपना विराट स्वरूप दिखाया। दो पगों में उन्होंने तीनों लोक नाप लिए। तीसरे पग के लिए जब स्थान नहीं बचा, तो राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया।
राजा बलि की भक्ति और वचन पालन से भगवान प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा बलि को आशीर्वाद दिया। इसी कथा के कारण पार्श्व एकादशी पर भगवान वामन की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।
पार्श्व एकादशी पूजा विधि
पार्श्व एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थान को साफ करें और भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी या भगवान वामन का चित्र स्थापित करें। यदि भगवान वामन का चित्र उपलब्ध न हो, तो भगवान विष्णु के चित्र के सामने पूजा की जा सकती है।
सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें। इसके बाद भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी दल, चंदन, धूप, दीप, फल और सात्विक भोग अर्पित करें। तुलसी दल भगवान विष्णु को बहुत प्रिय माना जाता है, इसलिए पूजा में तुलसी अवश्य रखें।
पूजा के समय “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें। यदि संभव हो तो विष्णु सहस्रनाम, विष्णु चालीसा या पार्श्व एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। शाम को दीप जलाकर भगवान विष्णु की आरती करें और परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करें।
व्रत के नियम
पार्श्व एकादशी व्रत में अन्न का त्याग करने की परंपरा है। कई भक्त इस दिन फलाहार करते हैं। कुछ लोग दूध, फल, मखाना या हल्का सात्विक आहार लेते हैं। व्रत हमेशा अपनी सेहत और क्षमता के अनुसार ही रखना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति बीमार है, बुजुर्ग है, गर्भवती है या दवा ले रहा है, तो कठोर उपवास नहीं करना चाहिए। ऐसे लोग सरल पूजा और भगवान विष्णु के नाम स्मरण के साथ भी व्रत का भाव रख सकते हैं।
इस दिन झूठ, क्रोध, निंदा, कटु वाणी और गलत विचारों से बचना चाहिए। एकादशी का वास्तविक अर्थ केवल भोजन छोड़ना नहीं, बल्कि मन, वाणी और व्यवहार को भी पवित्र रखना है।
पार्श्व एकादशी पर क्या करें?
इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करें। तुलसी दल अर्पित करें, मंत्रजाप करें और व्रत कथा सुनें। जरूरतमंदों को भोजन, फल, वस्त्र या अपनी क्षमता के अनुसार दान दें।
इस दिन अपने जीवन पर भी विचार करें। कौन-सी आदतें आपको पीछे खींच रही हैं, कौन-से विचार आपको परेशान कर रहे हैं और किस दिशा में बदलाव की जरूरत है—इन बातों पर शांत मन से सोचना भी इस व्रत का एक सुंदर हिस्सा है।
पार्श्व एकादशी पर क्या न करें?
इस दिन तामसिक भोजन, मांस, मदिरा और नशे से दूर रहना चाहिए। किसी का अपमान न करें और बेवजह विवाद न करें। पूजा को दिखावे का माध्यम न बनाएं।
व्रत रखते समय शरीर की क्षमता को अनदेखा न करें। यदि स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा है, तो खुद को कष्ट देकर व्रत न करें। भगवान भावना देखते हैं, इसलिए सच्चे मन से की गई सरल पूजा भी शुभ मानी जाती है।
पार्श्व एकादशी का आधुनिक संदेश
आज की तेज़ जीवनशैली में पार्श्व एकादशी का संदेश बहुत जरूरी है। यह एकादशी हमें बताती है कि जीवन में बदलाव बाहर से पहले भीतर शुरू होता है। जब व्यक्ति अपनी सोच बदलता है, तो उसका व्यवहार बदलता है। जब व्यवहार बदलता है, तो जीवन की दिशा भी धीरे-धीरे बदलने लगती है।
भगवान विष्णु का करवट बदलना भी इसी परिवर्तन का प्रतीक माना जा सकता है। हर व्यक्ति को समय-समय पर रुककर अपने कर्म, आदतों और निर्णयों को देखना चाहिए। पार्श्व एकादशी हमें यही अवसर देती है कि हम अपने जीवन में शुभ परिवर्तन का संकल्प लें।
निष्कर्ष
पार्श्व एकादशी 2026 मंगलवार, 22 सितंबर को मनाई जाएगी। यह व्रत भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और भगवान वामन की पूजा के लिए विशेष माना जाता है। इसे परिवर्तिनी एकादशी इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन श्रीहरि के योगनिद्रा में करवट बदलने की मान्यता है।
इस दिन व्रत, पूजा, कथा, मंत्रजाप और दान करने से मन में शांति और सकारात्मकता आती है। पार्श्व एकादशी का वास्तविक संदेश यही है कि जीवन में शुभ परिवर्तन लाने के लिए श्रद्धा, संयम, सही कर्म और भगवान विष्णु की भक्ति को अपनाना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. पार्श्व एकादशी 2026 कब है?
पार्श्व एकादशी 2026 मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी।
2. पार्श्व एकादशी को और किन नामों से जाना जाता है?
पार्श्व एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी, पद्मा एकादशी और जलझूलनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
3. पार्श्व एकादशी पर किसकी पूजा की जाती है?
इस दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और भगवान वामन की पूजा की जाती है।
4. पार्श्व एकादशी का पारण कब होगा?
पार्श्व एकादशी 2026 का पारण बुधवार, 23 सितंबर 2026 को किया जाएगा। सही समय के लिए अपने स्थानीय पंचांग को देखना उचित रहता है।
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